कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के शोर के बीच सूबे की सियासत गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए चुनाव आयोग में 29 पन्नों की एक विस्तृत शिकायत दर्ज कराई है। भाजपा ने मुख्यमंत्री पर केंद्रीय बलों के खिलाफ उकसावे वाले भाषण देने का आरोप लगाते हुए उनके चुनाव प्रचार पर 48 घंटे का प्रतिबंध लगाने और उन पर FIR दर्ज करने की मांग की है।

पूर्व IPS अधिकारी ने की शिकायत

जगतदल विधानसभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार और पूर्व आईपीएस अधिकारी राजेश कुमार ने यह शिकायत दर्ज कराई है। अपनी याचिका में उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आचार संहिता, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं का स्पष्ट उल्लंघन किया है।

शिकायत के मुख्य बिंदु: केंद्रीय बलों पर निशाना

भाजपा द्वारा सौंपी गई 29 पन्नों की इस रिपोर्ट में ममता बनर्जी के हालिया भाषणों को केंद्र बिंदु बनाया गया है। शिकायत में मुख्य रूप से निम्नलिखित आरोप लगाए गए हैं:

सांकेतिक उकसावा: मुख्यमंत्री ने सांस्कृतिक प्रतीकों और कूट भाषा का इस्तेमाल कर समर्थकों को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) के खिलाफ हिंसा के लिए प्रेरित किया।

झूठे आरोप लगाने की साजिश: याचिका में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री ने महिलाओं को सुरक्षा बलों के खिलाफ यौन उत्पीड़न के झूठे मामले दर्ज कराने के लिए उकसाया, ताकि मतदान प्रक्रिया में बाधा डाली जा सके।

स्टार प्रचारक का दर्जा: भाजपा ने मांग की है कि इन गंभीर उल्लंघनों को देखते हुए ममता बनर्जी से उनका 'स्टार प्रचारक' का दर्जा तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।

कड़ी कार्रवाई की मांग

भाजपा ने चुनाव आयोग से केवल प्रतिबंध ही नहीं, बल्कि सुरक्षा के कड़े इंतजामों की भी अपील की है:

FIR दर्ज हो: मुख्यमंत्री के खिलाफ उकसाऊ भाषणों के लिए कानूनी कार्रवाई की जाए।

वीडियोग्राफी: उनके भविष्य के सभी सार्वजनिक कार्यक्रमों और जनसभाओं की अनिवार्य रूप से वीडियोग्राफी कराई जाए।

सुरक्षा बल बढ़े: संवेदनशील इलाकों में केंद्रीय बलों की तैनाती में इजाफा किया जाए ताकि मतदाता बिना किसी डर के मतदान कर सकें।

चुनावी माहौल में तनाव

यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब बंगाल में गुरुवार को पहले चरण का मतदान होना है, जबकि दूसरे चरण के लिए 29 अप्रैल की तारीख निर्धारित है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पहले चरण से ठीक पहले इस तरह की कानूनी और प्रशासनिक लड़ाई से ध्रुवीकरण और तीखी बयानबाजी और तेज हो सकती है।

अब सबकी नजरें चुनाव आयोग के फैसले पर टिकी हैं कि क्या मुख्यमंत्री को पहले चरण के इस महाकुंभ के बीच प्रचार से रोका जाएगा या नहीं।