कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सियासत में कभी शिखर पर रहने वाली कांग्रेस आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है। जिस पार्टी ने बंगाल की पहली सरकार बनाई थी, आज वह चुनावी समर में बिल्कुल अकेली खड़ी नजर आ रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में शून्य पर सिमटने और 2024 के लोकसभा चुनाव में मात्र एक सीट बचाने वाली कांग्रेस के लिए यह चुनाव 'करो या मरो' की स्थिति जैसा है।
इंडिया ब्लॉक में दरार: 'अपने' हुए बेगाने
हैरानी की बात यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर 'INDIA' गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद बंगाल में कांग्रेस को उसके सहयोगियों का साथ नहीं मिल रहा है। गठबंधन के घटक दल न केवल कांग्रेस से किनारा कर रहे हैं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पक्ष में खुलकर बैटिंग कर रहे हैं।
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM): झारखंड में कांग्रेस के साथ सरकार चलाने वाले हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन ने बंगाल के आदिवासी क्षेत्रों में ममता बनर्जी के लिए प्रचार किया, लेकिन कांग्रेस की सुध नहीं ली।
आरजेडी (RJD): बिहार में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने वाले तेजस्वी यादव भी बंगाल में ममता दीदी के लिए वोट मांग चुके हैं।
आम आदमी पार्टी (AAP): अरविंद केजरीवाल भी रविवार को कोलकाता आकर ममता बनर्जी के समर्थन में अपील करेंगे।
समाजवादी पार्टी (SP): अखिलेश यादव ने अभी तक बंगाल के रण में अपने पत्ते नहीं खोले हैं, जबकि राहुल गांधी के साथ उनकी 'केमिस्ट्री' सर्वविदित है।
वाममोर्चा से किनारा, खुद के दम पर चुनौती
इस बार कांग्रेस की रणनीति में एक बड़ा बदलाव दिखा है। सालों तक वामपंथी दलों की 'बैसाखी' के सहारे चलने वाली कांग्रेस ने इस बार खुद ही वाममोर्चा से किनारा कर लिया है। पार्टी ने अपने बूते चुनाव लड़ने का जोखिम भरा फैसला लिया है, जो राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार उसकी सांगठनिक क्षमता की असली परीक्षा होगी।
केंद्रीय नेतृत्व की 'ठंडी' सक्रियता
एक ओर जहां भाजपा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह समेत केंद्रीय मंत्रियों की फौज मैदान में डटी है, वहीं कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व बंगाल में कम सक्रिय नजर आ रहा है:
मल्लिकार्जुन खरगे: अब तक केवल दो बार बंगाल आए।
राहुल गांधी: पहले और दूसरे चरण में केवल एक-एक बार ही जनसभाएं कीं।
प्रियंका गांधी: प्रचार अभियान से अब तक पूरी तरह नदारद हैं।
विरासत बचाने की जद्दोजहद
बंगाल की राजनीति में हाशिये पर जा चुकी कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने परंपरागत वोट बैंक को एकजुट रखने की है। टीएमसी और भाजपा के बीच हो रहे ध्रुवीकरण के इस मुकाबले में कांग्रेस का 'एकला चलो रे' का नारा उसे संजीवनी देता है या फिर और गहरे संकट में डालता है, यह तो चुनाव के नतीजे ही बताएंगे।
सियासी नजरिया: "बंगाल में कांग्रेस के लिए यह केवल सत्ता की नहीं, बल्कि अपनी पहचान बचाने की लड़ाई है। सहयोगियों के अभाव और सीमित संसाधनों के बीच पार्टी का भविष्य अब उसके समर्पित कार्यकर्ताओं के कंधों पर है।"





