बिहार में उपचुनाव की सरगर्मी के बीच 'जीविका दीदी' का मुद्दा एक बार फिर राज्य की राजनीति के केंद्र में आ गया है। जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन और स्थानीय प्रशासन पर जीविका दीदी कैडर के राजनीतिक और गलत इस्तेमाल का गंभीर आरोप लगाया है।
पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए प्रशांत किशोर ने चेतावनी दी है कि यदि अगले 24 घंटों के भीतर जीविका दीदी कैडर को पूरी चुनाव प्रक्रिया से अलग नहीं किया गया, तो वे और उनकी पार्टी के कार्यकर्ता चुनाव आयोग के दफ्तर के बाहर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठेंगे।
क्या है पूरा विवाद?
प्रशांत किशोर का आरोप है कि मतदाताओं को सरकारी योजनाओं के लाभ बंद करने की धमकी देकर डराया-धमकाया जा रहा है। उन्होंने प्रशासनिक तंत्र और स्थानीय अधिकारियों की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि विपक्ष और जन सुराज के समर्थकों को परेशान किया जा रहा है, जबकि सत्तापक्ष को खुली छूट मिली हुई है। प्रशांत किशोर के अनुसार, इस विषय पर चुनाव आयोग से दो बार लिखित शिकायत भी की जा चुकी है।
"सरकारी तंत्र का दुरुपयोग कर मतदाताओं में यह भय पैदा किया जा रहा है कि एनडीए के पक्ष में वोट न देने पर उन्हें योजनाओं के लाभ से वंचित कर दिया जाएगा।" — प्रशांत किशोर, सूत्रधार, जन सुराज
आखिर कितनी बड़ी ताकत हैं 'जीविका दीदी'?
बिहार ग्रामीण आजीविका मिशन (जीविका) की शुरुआत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में विश्व बैंक के सहयोग से हुई थी। आज यह राज्य का सबसे बड़ा और सुसंगठित जमीनी नेटवर्क बन चुका है:
विशाल नेटवर्क: राज्य में 13 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूह (SHG) सक्रिय हैं।
बड़ी भागीदारी: इस नेटवर्क से 1.4 करोड़ से ज्यादा महिलाएं सीधे तौर पर जुड़ी हैं।
आर्थिक मजबूती: प्रत्येक समूह में 10 से 15 महिलाएं होती हैं, जो बचत और ऋण की व्यवस्था संभालती हैं। ये महिलाएं हर महीने औसतन ₹10,000 से ₹25,000 तक की कमाई कर रही हैं।
वित्तीय दायरा: यह समूह अब तक लगभग ₹34,000 करोड़ का ऋण ले चुका है, और सरकार का लक्ष्य इसके सदस्यों की संख्या को 1.5 करोड़ तक पहुंचाने का है।
चुनाव में क्यों उठता है जीविका दीदी पर विवाद?
चूंकि यह नेटवर्क हर गांव और पंचायत स्तर तक सरकार व आम महिलाओं के बीच सीधा संपर्क सूत्र है, इसलिए चुनावी मौसम में इस पर सवाल उठते रहे हैं:
वोटरों की गोलबंदी: विपक्ष का आरोप है कि मतदान से ठीक पहले इन समूहों की बैठकों के जरिए महिला मतदाताओं को सत्तापक्ष के अनुकूल संदेश दिए जाते हैं।
योजनाओं का दबाव: आरोप है कि लोन और अनुदान का जरिया होने के कारण महिलाओं पर अप्रत्यक्ष रूप से एक खास पक्ष में मतदान का दबाव बनाया जाता है।
बूथ प्रबंधन: बूथ स्तर पर महिलाओं को मतदान केंद्र तक लाने-ले जाने में भी इस कैडर के अनौपचारिक उपयोग के आरोप लगते रहे हैं।
हालांकि, सरकार और जीविका प्रशासन इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे केवल महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण का माध्यम बताते रहे हैं।
चुनाव आयोग के रुख पर टिकीं नजरें
प्रशांत किशोर के अल्टीमेटम के बाद अब सबकी नजरें चुनाव आयोग के फैसले पर टिकी हैं। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भी जन सुराज पर पलटवार करते हुए उनके चुनावी खर्च और प्रचार के तरीकों को लेकर आयोग में शिकायत दर्ज कराई है। बांकीपुर उपचुनाव के इस सियासी घमासान में आने वाले दिन बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं।





