रांची/गुवाहाटी | 'इंडिया' (I.N.D.I.A.) गठबंधन की एकजुटता को असम के मैदान में बड़ा झटका लगा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने असम की 21 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर गठबंधन की कड़ियों को कमजोर कर दिया है। यह केवल चुनावी सीटों का बंटवारा नहीं है, बल्कि झारखंड की राजनीति के दो बड़े स्तंभों—कांग्रेस और झामुमो—के बीच बढ़ते अविश्वास का संकेत भी है।

तीर-कमान और आदिवासी अस्मिता का दांव

झामुमो प्रवक्ता मनोज पांडेय का मानना है कि 'तीर-कमान' केवल एक चुनाव चिह्न नहीं, बल्कि चाय बागान श्रमिकों और झारखंडी मूल के आदिवासियों के गौरव की पहचान है। पार्टी असम को अपने राष्ट्रीय विस्तार का 'लॉन्चिंग पैड' मान रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन के नेतृत्व में 20 स्टार प्रचारकों की फौज उतारकर झामुमो ने साफ कर दिया है कि वह क्षेत्रीय दल की छवि से बाहर निकलना चाहती है।

कांग्रेस की नाराजगी: 'बड़ा दिल' बनाम 'हठ'

दूसरी ओर, कांग्रेस इस बिखराव के लिए झामुमो की 'जिद' को जिम्मेदार ठहरा रही है। कांग्रेस प्रवक्ता राकेश सिन्हा के अनुसार, झामुमो पहले से ही 21 सीटों का मन बना चुका था, जिससे समझौते की गुंजाइश खत्म हो गई। गौरव गोगोई की रांची यात्रा और हेमंत सोरेन की दिल्ली में आलाकमान से मुलाकात के बावजूद भरोसे की कमी साफ नजर आई।

झारखंड की राजनीति पर पड़ने वाले 'तीन बड़े असर'

जमीनी स्तर पर भरोसे का संकट: झारखंड में दोनों दल मिलकर सरकार चला रहे हैं, लेकिन असम में एक-दूसरे के खिलाफ लड़ने से कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति पैदा होगी। यह 'अंडरकरंट' भविष्य के उपचुनावों और स्थानीय निकायों में गठबंधन की धार को कुंद कर सकता है।

भाजपा की रणनीतिक बढ़त: भाजपा ने इस दरार को "शून्य बटा सन्नाटा" करार दिया है। हेमंत सोरेन के दिल्ली दौरे के बाद झामुमो-भाजपा की कथित 'नजदीकी' की अटकलें, चाहे वे कितनी भी निराधार हों, गठबंधन के भीतर शक का बीज बोने के लिए काफी हैं।

वर्चस्व की नई लड़ाई: यदि झामुमो असम में सफल होता है, तो वह झारखंड में भी कांग्रेस के मुकाबले 'बड़े भाई' की भूमिका में और अधिक आक्रामक होगा। यह राष्ट्रीय पार्टी (कांग्रेस) और क्षेत्रीय शक्ति (झामुमो) के बीच वर्चस्व की एक नई जंग की शुरुआत हो सकती है।

निष्कर्ष: असम में गठबंधन का टूटना 'इंडिया' ब्लॉक के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। यदि विपक्षी दल साझा लक्ष्य के बजाय व्यक्तिगत विस्तार को प्राथमिकता देंगे, तो इसका सीधा लाभ एनडीए (NDA) को मिल सकता है।