बेंगलुरु/नई दिल्ली। कर्नाटक विधानसभा के बजट सत्र के समापन के साथ ही राज्य की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है। उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के अचानक दिल्ली दौरे ने 'सत्ता हस्तांतरण' (Power-sharing pact) की चर्चाओं को हवा दे दी है। हालांकि शिवकुमार इसे एक सामान्य दौरा बता रहे हैं, लेकिन विपक्ष ने इसे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कब्जे की अंतिम कोशिश करार दिया है।

शिवकुमार का दिल्ली दौरा: 'शादी का निमंत्रण' या 'शक्ति प्रदर्शन'?

डीके शिवकुमार ने दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत के दौरान अपने दौरे के पीछे संगठनात्मक कार्यों और एक पारिवारिक शादी का हवाला दिया। उन्होंने कहा:

गोपनीयता: "मैं दिल्ली आता हूँ तो सभी से मिलता हूँ। मैं अपना पूरा कार्यक्रम सार्वजनिक नहीं कर सकता।"

छह साल का कार्यकाल: उन्होंने अपने केपीसीसी (KPCC) अध्यक्ष के रूप में छह साल पूरे होने के उपलक्ष्य में कल बेंगलुरु में विधायकों के लिए एक भव्य रात्रिभोज (Dinner Party) आयोजित करने की भी जानकारी दी।

भाजपा का तीखा हमला: "17वें बजट का इंतजार खत्म हुआ"

विपक्षी दल भाजपा ने शिवकुमार के दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। वरिष्ठ भाजपा नेता सुरेश कुमार ने आरोप लगाया कि शिवकुमार केवल मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के 17वें बजट के पेश होने का इंतजार कर रहे थे। भाजपा के अनुसार:

रणनीतिक कदम: अब जब बजट सत्र समाप्त हो चुका है, शिवकुमार ने अपनी दावेदारी पेश करने के लिए निर्णायक कदम उठाना शुरू कर दिया है।

आंतरिक कलह: भाजपा का मानना है कि कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए चल रहा संघर्ष अब अपने सबसे महत्वपूर्ण चरण में पहुँच गया है।

सिद्धारमैया का पलटवार: "दो और बजट पेश करूँगा"

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी हाल ही में कड़े तेवर दिखाते हुए स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वे अपना कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं। एक सार्वजनिक बातचीत के दौरान उन्होंने कहा:

"अगर हाईकमान ने अनुमति दी, तो मैं दो और बजट पेश करूँगा। मुझे पार्टी नेतृत्व के समर्थन पर पूरा भरोसा है।"

कल का 'डिनर' होगा निर्णायक?

कल बेंगलुरु में होने वाले विधायकों के रात्रिभोज को शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि विधायकों का समर्थन जुटाने की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है।

मुख्य बिंदु:

सिद्धारमैया का रुख: पूरे कार्यकाल और भविष्य के बजट की योजना पर अडिग।

शिवकुमार की रणनीति: दिल्ली में आलाकमान से मुलाकात और बेंगलुरु में विधायकों की लामबंदी।

भाजपा का नजरिया: कांग्रेस सरकार के भीतर छिपे नेतृत्व संकट का पर्दाफाश।