चेन्नई | विधि संवाददाता तमिलनाडु में एक विधानसभा सीट पर जीत-हार के सबसे करीबी अंतर ने अब निर्वाचित विधायक के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है। मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) के विधायक आर श्रीनिवास सेतुपति को विधानसभा की कार्यवाही में भाग लेने से फिलहाल रोक दिया है।
मामला क्या है? (सिर्फ एक वोट का अंतर)
तिरुपत्तूर विधानसभा सीट पर चुनाव परिणाम ने सबको चौंका दिया था:
आर श्रीनिवास सेतुपति (TVK): 83,365 वोट मिले।
केआर पेरियाकरुप्पन (DMK): 83,364 वोट मिले। सिर्फ एक वोट की इस जीत ने पराजित उम्मीदवार को कोर्ट जाने का आधार दे दिया।
DMK उम्मीदवार के आरोप और याचिका
डीएमके नेता पेरियाकरुप्पन ने चुनाव परिणाम को चुनौती देते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं:
पोस्टल बैलेट की गड़बड़ी: याचिका में दावा किया गया कि एक पोस्टल बैलेट (डाक मतपत्र) जो तिरुपत्तूर विधानसभा क्षेत्र संख्या-185 के लिए था, उसे गलत तरीके से वेल्लोर जिले के तिरुपत्तूर विधानसभा क्षेत्र संख्या-50 में जोड़ दिया गया।
चुनाव आयोग की अनदेखी: पेरियाकरुप्पन का कहना है कि उन्होंने इसकी शिकायत चुनाव आयोग से की थी, लेकिन कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई।
हाईकोर्ट का कड़ा रुख
जस्टिस विक्टोरिया गौरी और जस्टिस सेंथिलकुमार की बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए निम्नलिखित आदेश दिए:
कार्यवाही पर रोक: विधायक सेतुपति अगले आदेश तक विधानसभा की किसी भी कार्यवाही (विशेष रूप से विश्वास मत) में हिस्सा नहीं ले सकेंगे।
सबूतों का संरक्षण: कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि मतगणना, पोस्टल बैलेट की जांच और पुनर्सत्यापन से संबंधित सभी वीडियो फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सुरक्षित रखा जाए।
सीलबंद मतपत्र: यदि निर्वाचन क्षेत्र संख्या-185 का कोई मतपत्र निर्वाचन क्षेत्र संख्या-50 में पाया गया है, तो उसे तुरंत सीलबंद और संरक्षित किया जाए।
चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग ने कोर्ट में दलील दी कि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद केवल चुनाव याचिका (Election Petition) ही स्वीकार्य है। आयोग ने यह भी दावा किया कि कोई भी डाक मतपत्र दूसरे क्षेत्र में स्थानांतरित नहीं हुआ था। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि पेरियाकरुप्पन द्वारा प्रस्तुत शिकायत में प्रथम दृष्टया पर्याप्त सबूत मौजूद हैं।
आगे क्या?
हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को इस मसले पर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस फैसले के बाद तिरुपत्तूर सीट पर फिर से मतगणना या कानूनी लड़ाई की संभावना बढ़ गई है। यह मामला भारतीय चुनाव इतिहास में 'एक वोट की कीमत' और चुनावी पारदर्शिता का एक बड़ा उदाहरण बन गया है।
विश्लेषण: लोकतंत्र में जब फैसला एक वोट से होता है, तो शुचिता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। मद्रास हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप यह सुनिश्चित करने की दिशा में है कि जनता का वास्तविक जनादेश ही सदन तक पहुँचे।





