मुंबई

महाराष्ट्र विधान परिषद की 17 सीटों के लिए महायुति (भाजपा, शिवसेना-शिंदे गुट और राकांपा-अजित पवार गुट) में लंबे मंथन और खींचतान के बाद आखिरकार सीटों का बंटवारा तो तय हो गया है, लेकिन इसके साथ ही गठबंधन के भीतर असंतोष का ज्वालामुखी भी फूट पड़ा है। कई सीटों पर स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी ने महायुति नेतृत्व की रातों की नींद उड़ा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस असहमति को समय रहते शांत नहीं किया गया, तो मजबूत स्थिति में होने के बावजूद महायुति को कुछ सीटों पर कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

सीट शेयरिंग का गणित: शिवसेना को करना पड़ा समझौता

इस सीट बंटवारे में सबसे ज्यादा चर्चा मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना को लेकर हो रही है।

शिवसेना (शिंदे गुट): पार्टी शुरुआती दौर में 6 सीटों की मांग पर अड़ी थी, लेकिन भाजपा के कड़े रुख के आगे उन्हें आखिरकार 4 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा।

राकांपा (अजित पवार गुट): अजित पवार की पार्टी के खाते में 2 सीटें (पुणे और रायगढ़) आई हैं।

प्रमुख सीटों पर रार और अपनों के बागी तेवर

महायुति ने उम्मीदवारों का ऐलान तो कर दिया है, लेकिन जमीन पर समीकरण उलझते दिख रहे हैं:

क्षेत्र / सीटमहायुति उम्मीदवारअसंतोष / बगावत की स्थिति
रायगढ़सुनील तटकरे के बेटे (NCP)शिवसेना विधायक महेंद्र दलवी की बेटी ने निर्दलीय नामांकन दाखिल कर चुनौती दी है।
धाराशिव-बीड़-लातूरबसवराज पाटिल (BJP)हाल ही में कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए पाटिल को टिकट मिलने से पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ता नाराज हैं।
जालना-छत्रपति संभाजीनगरअरुण शिरसाठ (BJP)शिवसेना यह सीट चाहती थी। अब पूर्व मंत्री अब्दुल सत्तार ने अपने बेटे समीर का नामांकन कराकर बगावत कर दी है।
यवतमालदुष्यंत चतुर्वेदी (शिवसेना)मंत्री संजय राठौड़ अपनी पत्नी के लिए टिकट चाहते थे, मांग पूरी न होने से स्थानीय स्तर पर मतभेद हैं।

ठाणे और नासिक में बीजेपी को पीछे हटना पड़ा:

ठाणे और नासिक की सीटों पर भाजपा बेहद मजबूत स्थिति में थी, लेकिन गठबंधन धर्म के चलते उसे ये सीटें शिंदे गुट के लिए छोड़नी पड़ीं। नासिक से नरेंद्र दराडे और ठाणे से रवींद्र फाटक को महायुति (शिवसेना) का उम्मीदवार बनाया गया है। इसके अलावा वर्धा-चंद्रपुर-गड़चिरौली सीट से भाजपा ने अरुण लखानी को उतारा है, जो सांसद सुप्रिया सुले के समधी हैं।

संख्या बल में महायुति आगे, पर 'भीतरघात' का डर

अगर मौजूदा राजनीतिक समीकरणों और विधानसभा में उपलब्ध विधायकों की संख्या को देखें, तो महायुति विधान परिषद की सभी 17 सीटों पर बेहद मजबूत स्थिति में नजर आ रही है। गठबंधन के पास जीत के लिए आवश्यक मतों का पर्याप्त और सुरक्षित कोटा मौजूद है, जिससे अधिकांश सीटों पर उनकी राह आसान दिखती है।

नामांकन वापसी के दिन पर टिकीं नजरें

राजनीतिक जानकारों का स्पष्ट कहना है कि चुनावी जीत का गणित केवल कागजी संख्या बल पर नहीं, बल्कि जमीन पर सहयोगी दलों के बीच समन्वय पर निर्भर करता है। यदि नामांकन वापसी की अंतिम तिथि तक महायुति का शीर्ष नेतृत्व अपने नाराज नेताओं और बागियों को मनाने में असफल रहा, तो अंदरूनी कलह खेल बिगाड़ सकती है। अब देखना दिलचस्प होगा कि डैमेज कंट्रोल के लिए महायुति के सिपहसालार क्या रणनीति अपनाते हैं।