नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में इन दिनों आया सियासी भूचाल अपने चरम पर है। पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली-पंजाब तक, विपक्षी खेमों में मची अभूतपूर्व भगदड़ ने देश के 'दलबदल विरोधी कानून' (Anti-Defection Law) को एक बार फिर कानूनी और नैतिक कटघरे में खड़ा कर दिया है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य ने इस पुरानी बहस को पुनर्जीवित कर दिया है कि क्या मूल पार्टी के विलय के बिना, सिर्फ दो-तिहाई (2/3) सांसदों या विधायकों का टूट जाना तकनीकी रूप से सही है?

इस बगावती तेवर के कारण ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC), उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) जैसी मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों के पैर तले से जमीन खिसकती नजर आ रही है।

विपक्षी खेमे में महासंग्राम: क्या कहते हैं ताजा आंकड़े?

फिलहाल जो सियासी समीकरण उभरकर सामने आ रहे हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। तीनों प्रमुख विपक्षी दलों में आंतरिक टूट की स्थिति कुछ इस प्रकार है:

मूल राजनीतिक दलबगावत का मौजूदा गणितकहाँ जा रहे हैं बागी?
तृणमूल कांग्रेस (TMC)28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद अलग हुए'नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) में विलय का दावा।
शिवसेना (UBT)9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसद बागीएकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का रुख किया।
आम आदमी पार्टी (AAP)10 राज्यसभा सांसदों में से 7 सांसद (राघव चड्ढा की अगुवाई में)भारतीय जनता पार्टी (BJP) की तरफ झुकाव।

क्या है इस पूरी पहेली का 'गोवा कनेक्शन'?

इन तीनों क्षेत्रीय क्षत्रपों (ममता, उद्धव और केजरीवाल) की पार्टियों का भविष्य अब साल 2019 के 'गोवा मॉडल' से तय होने वाला है।

2019 का वाक्या: गोवा में कांग्रेस के 15 में से 10 विधायक एक साथ टूटकर भाजपा में शामिल हो गए थे। हालांकि, मूल कांग्रेस पार्टी का भाजपा में कोई विलय नहीं हुआ था।

विधानसभा अध्यक्ष का फैसला: इसके बावजूद गोवा विधानसभा के स्पीकर ने सिर्फ विधायकों की संख्या (2/3 बहुमत) को आधार मानकर इस दलबदल को हरी झंडी दे दी, जिसे बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी सही ठहराया।

कानूनी पेंच: क्या कहती है संविधान विशेषज्ञों की राय?

देश के प्रतिष्ठित संविधान विशेषज्ञ और पूर्व लोकसभा महासचिव पीडीटी आचारी सहित कई कानूनी विश्लेषक गोवा के इस फैसले को पूरी तरह सही नहीं मानते हैं।

"दलबदल विरोधी कानून की भाषा बेहद स्पष्ट है। आप कानून की दो शर्तों को अलग करके नहीं देख सकते। वैध विलय के लिए दो चीजें एक साथ होनी अनिवार्य हैं—पहला, मूल राजनैतिक दल का दूसरी पार्टी में विलय हो और दूसरा, उस दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य इस फैसले से सहमत हों। सिर्फ सदस्यों का टूट जाना विलय नहीं कहलाता।" — संविधान विशेषज्ञों का सामूहिक मत

वर्तमान में यह पूरा विवाद 'गिरीश चोडनकर बनाम स्पीकर, गोवा विधानसभा' के नाम से देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) के समक्ष लंबित है। अब सुप्रीम कोर्ट का जो भी अंतिम फैसला आएगा, वही देश की राजनीति की नई दिशा तय करेगा और इसी से स्पष्ट होगा कि विपक्ष के बागी सांसदों की सदस्यता बचेगी या जाएगी।

दलबदल कानून और वो 'लूपहोल'

नेताओं द्वारा अपनी मर्जी से पाला बदलने की कुप्रथा (आया राम, गया राम संस्कृति) को रोकने के लिए साल 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए 'एंटी-डिफेक्शन लॉ' लाया गया था, जिसे संविधान की 10वीं अनुसूची कहा जाता है। इसके तहत यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से पार्टी छोड़ता है या व्हिप का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है।

2003 का संसोधन: शुरुआत में इस कानून से बचने के दो रास्ते थे—पहला 'विभाजन' (Split - 1/3 सदस्य) और दूसरा 'विलय' (Merger - 2/3 सदस्य)।

बंद हुआ रास्ता: लेकिन जब राजनेताओं ने 'स्प्लिट' के प्रावधान का दुरुपयोग करना शुरू किया, तो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने साल 2003 में 91वां संविधान संशोधन करके 'विभाजन' वाले रास्ते को हमेशा के लिए बंद कर दिया। अब केवल 2/3 सदस्यों के साथ 'विलय' का रास्ता ही खुला है, जिसकी कानूनी व्याख्या पर अब सुप्रीम कोर्ट का अंतिम मुहर लगाना बाकी है।

संपादकीय दृष्टिकोण: यदि सुप्रीम कोर्ट गोवा स्पीकर के फैसले को पलटता है, तो देश भर में बागी सांसदों और विधायकों की सदस्यता पर तलवार लटक जाएगी। इसके विपरीत, यदि अदालत 2/3 संख्या बल को ही प्राथमिकता देती है, तो भविष्य में क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व को बचाए रखना एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य बन जाएगा।