लखनऊ | उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही सियासी पारा चढ़ने लगा है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने आधी आबादी यानी महिला मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए एक भावनात्मक और रणनीतिक दांव खेला है। आज, 22 मार्च को लखनऊ स्थित पार्टी मुख्यालय में वे 'मूर्ति देवी-मालती देवी महिला सम्मान' योजना का औपचारिक आगाज करेंगे।

अपनों के नाम, महिलाओं का सम्मान

अखिलेश यादव ने इस सम्मान योजना का नाम अपनी दादी (मूर्ति देवी) और माता (मालती देवी) के नाम पर रखा है। इसे सपा की पुरानी छवि को बदलकर 'महिला हितैषी' दल के रूप में स्थापित करने की कोशिश माना जा रहा है।

पुरस्कार की राशि: चयनित महिलाओं को 1 लाख रुपये की सम्मान राशि दी जाएगी।

20 श्रेणियां: यह सम्मान समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाली महिलाओं को दिया जाएगा।

महान विभूतियों को नमन: पुरस्कार की श्रेणियां रानी लक्ष्मी बाई, सावित्री बाई फुले, फूलन देवी, बेगम अख्तर, और महादेवी वर्मा जैसी महान हस्तियों के नाम पर रखी गई हैं, जो सपा के सामाजिक न्याय के एजेंडे को भी मजबूती देती हैं।

आज 11 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस: होंगी बड़ी घोषणाएं

अखिलेश यादव आज सुबह 11 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए इस योजना का खाका पेश करेंगे। सूत्रों के अनुसार, वे न केवल इस सम्मान राशि के वितरण की प्रक्रिया बताएंगे, बल्कि आगामी चुनावों के मद्देनजर महिलाओं के लिए फ्री बस यात्रा, पेंशन या शिक्षा से जुड़ी कुछ अन्य 'चुनावी गारंटियों' का ऐलान भी कर सकते हैं।

सियासी मायने: क्यों जरूरी है महिला वोट बैंक?

यूपी की राजनीति में हाल के वर्षों में महिला मतदाता एक 'साइलेंट वोटर' के रूप में उभरी हैं, जिसने चुनावी नतीजों को पलटने में बड़ी भूमिका निभाई है।

भाजपा को टक्कर: उज्ज्वला और राशन जैसी योजनाओं के जरिए भाजपा का महिला वोट बैंक पर मजबूत कब्जा रहा है। अखिलेश इस नई स्कीम से उस किले में सेंध लगाना चाहते हैं।

भावनात्मक जुड़ाव: दादी और मां के नाम का उपयोग कर अखिलेश ने मतदाताओं से सीधा भावनात्मक जुड़ाव बनाने की कोशिश की है।

विपक्षी खेमे में हलचल: सपा की इस सक्रियता ने सत्ताधारी भाजपा और अन्य दलों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

दूसरी तरफ: मुख्यमंत्री योगी की 'किलबंदी'

समाजवादी पार्टी की इस सक्रियता के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी शांत नहीं हैं। वे लगातार RSS (आरएसएस) के पदाधिकारियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों (विशेषकर महिलाओं) तक पहुंच बनाने के लिए नई रणनीति तैयार की जा रही है।

निष्कर्ष: यूपी में विधानसभा चुनाव भले ही अगले साल हों, लेकिन 'सम्मान' और 'संवाद' के जरिए शुरू हुई यह जंग बता रही है कि इस बार मुकाबला बेहद कड़ा और दिलचस्प होने वाला है।