नई दिल्ली।
आगामी 20 जुलाई, 2026 से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र का पहला ही दिन बेहद हंगामेदार रहने के आसार हैं। केंद्र सरकार इस सत्र में राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' का अपमान करने या उसके गायन में जानबूझकर बाधा डालने को एक दंडनीय अपराध बनाने के लिए एक ऐतिहासिक विधेयक पेश करने जा रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मानसून सत्र के पहले दिन यानी सोमवार को इस प्रस्तावित बिल को राज्यसभा के पटल पर रखेंगे। हालांकि, संसद की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही इस विधेयक को लेकर पक्ष और विपक्ष के बीच एक नया सियासी और कानूनी संग्राम छिड़ गया है।
क्यों खास है यह विधेयक? सरकार का तर्क
प्रस्तावित विधेयक के अनुसार, सरकार 'राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971' (Prevention of Insults to National Honour Act, 1971) में एक बड़ा संशोधन करने जा रही है। इस संशोधन के तहत राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' को भी इस कानून के दायरे में शामिल किया जाएगा।
सरकार का मुख्य तर्क है कि 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा की बैठक में तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट रूप से कहा था कि 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान ही सम्मान और दर्जा प्राप्त होगा। हालांकि, पिछले सात दशकों में ऐसा कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं बनाया गया जो वंदे मातरम के अपमान या उसके गायन में बाधा डालने पर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करता हो। सरकार के अनुसार, यह नया संशोधन इसी ऐतिहासिक कमी को दूर करने के लिए लाया जा रहा है, जिससे राष्ट्रीय गीत को भी राष्ट्रगान की तरह समान कानूनी संरक्षण मिल सके।
'जबरदस्ती थोपना उचित नहीं'—विपक्ष का तीखा पलटवार
दूसरी तरफ, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस प्रस्तावित विधेयक का कड़ा विरोध करते हुए इसे संविधान की मूल भावना के खिलाफ करार दिया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हुसैन दलवई ने इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा:
"वंदे मातरम के केवल पहले दो पदों (अंतरों) को ही आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। मैं स्वयं एक मुस्लिम हूं और मैं वंदे मातरम कहता हूं, लेकिन पूरे गीत का पाठ करने के लिए नागरिकों पर दबाव डालना या इसे जबरदस्ती थोपना पूरी तरह गलत है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और यहां संविधान के खिलाफ कुछ भी नहीं किया जा सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपनी शाखाओं में राष्ट्रगान जन गण मन की जगह जानबूझकर पूरा वंदे मातरम गाता है।"
कानूनी बाध्यता बनाम स्वैच्छिक सम्मान की बहस
यदि यह विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हो जाता है, तो भविष्य में वंदे मातरम का अपमान करना या उसके सामूहिक गायन में जानबूझकर व्यवधान डालना एक गंभीर कानूनी और दंडनीय अपराध की श्रेणी में आ जाएगा। सरकार के इस कदम ने देश के राजनीतिक और कानूनी गलियारों में एक नई वैचारिक बहस को जन्म दे दिया है—क्या राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े प्रतीकों की रक्षा के लिए कानून को सख्त और दंडात्मक बनाना आवश्यक है, या फिर राष्ट्र के प्रति सम्मान नागरिकों के भीतर जागरूकता, स्वेच्छा और आपसी सहमति से ही सुनिश्चित होना चाहिए? सोमवार को राज्यसभा में बिल पेश होने के बाद इस पर टकराव और बढ़ने की उम्मीद है।





