लखनऊ:
उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों एक नया और बेहद आक्रामक ट्रेंड देखने को मिल रहा है। सुभासपा (SBSP) प्रमुख और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव और उनके कोर वोट बैंक के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। राजभर सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक लगातार हमलावर हैं। पहली नजर में यह केवल दो नेताओं की जुबानी जंग लग सकती है, लेकिन गहराई से देखें तो राजभर यूपी की राजनीति में 'गैर-यादव ओबीसी' (Non-Yadav OBC) ध्रुवीकरण की एक बड़ी बिसात बिछा रहे हैं।
क्या है राजभर की रणनीति और क्यों चुन रहे हैं यह रास्ता?
यह जगजाहिर है कि उत्तर प्रदेश में यादव मतदाता समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत और वफादार आधार हैं। राजभर जानते हैं कि यादव वोट बैंक को सपा से अलग करना नामुमकिन के बराबर है। इसलिए, उनकी रणनीति यादवों को साधने की नहीं, बल्कि उनके खिलाफ आक्रामक रुख अपनाकर बाकी की अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) को एक मंच पर लाने की है। वह लगातार ऐसे पोस्ट और बयान साझा कर रहे हैं जो सपा के दौर के आपराधिक रिकॉर्ड और प्रशासनिक वर्चस्व को उजागर करते हैं।
यूपी-बिहार की सियासत का वो 'बिहार फॉर्मूला', जो अब यूपी में दोहराया जा रहा है
यदि आप सोच रहे हैं कि राजभर अचानक ऐसा क्यों कर रहे हैं, तो इसकी कहानी 1990 के दशक के बिहार से जुड़ी है। उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति की तासीर काफी हद तक एक जैसी है:
बिहार का 'एमवाई' बनाम गैर-यादव: 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने बिहार में 'मुस्लिम-यादव' (MY) का एक अपराजेय समीकरण बनाया था। तब यह धारणा बनने लगी कि सत्ता का सबसे अधिक लाभ सिर्फ एक विशेष वर्ग को मिल रहा है।
नीतीश कुमार का उदय: इसी धारणा को हथियार बनाकर समता पार्टी (बाद में जदयू) और नीतीश कुमार ने गैर-यादव पिछड़ी जातियों जैसे—कुर्मी, कुशवाहा, निषाद, नोनिया, तेली और मल्लाह को एकजुट किया। संदेश दिया गया कि वर्चस्व को चुनौती दिए बिना बाकी पिछड़ों को हक नहीं मिलेगा। यह फॉर्मूला नीतीश की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बना।
अब यूपी में वही दोहराव: उत्तर प्रदेश में ठीक यही काम अब ओम प्रकाश राजभर कर रहे हैं। हाल ही में लखनऊ की सड़कों पर अखिलेश यादव के खिलाफ 'यादववाद' के आरोप लगाने वाले पोस्टर भी इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।
राजभर के तीखे तेवर और 'बैकस्टेज' से बीजेपी का फायदा
सपा भले ही 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा देकर सबको साथ लाने का दावा करती हो, लेकिन राजभर लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि सपा की राजनीति में आज भी केवल यादवों का ही दबदबा है।
इस पूरी घेराबंदी से सबसे बड़ा फायदा भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को होने वाला है:
सोशल इंजीनियरिंग को मजबूती: 2014 के बाद से बीजेपी की यूपी में कामयाबी का बड़ा आधार 'गैर-यादव ओबीसी' और 'गैर-जाटव दलित' वोट बैंक रहा है।
बीजेपी की मूक सहमति: बीजेपी बखूबी जानती है कि वह खुद सीधे तौर पर किसी एक जाति पर फ्रंटफुट से हमला नहीं कर सकती। ऐसे में एनडीए के सहयोगी होने के नाते ओम प्रकाश राजभर वह काम बखूबी कर रहे हैं, जिसे कहने से बीजेपी सीधे तौर पर बचती है।
निष्कर्ष:
ओम प्रकाश राजभर का यह दांव यूपी की राजनीति को एक बार फिर मंडल-दौर के उस मोड़ पर ले जा रहा है, जहां पिछड़ों के भीतर ही 'हक और हिस्सेदारी' की लड़ाई शुरू हो जाती है। अब देखना यह होगा कि क्या राजभर का यह 'बिहार मॉडल' उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के बढ़ते कुनबे को रोकने में मददगार साबित होता है या नहीं।





