जयपुर/नई दिल्ली।

राजस्थान की राजनीति में 'जादूगर' के नाम से मशहूर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक बार फिर सियासी गलियारों में अपनी छड़ी घुमाई है। लेकिन इस बार का जादू किसी जीत का जश्न मनाने के लिए नहीं, बल्कि अपना पुराना दर्द बयां करने के लिए है। गहलोत का यह दावा कि 2022 में उनके खिलाफ एक बड़ी ‘साजिश’ रची गई थी ताकि वे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष न बन सकें, ने न सिर्फ कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी को चौराहे पर ला दिया है, बल्कि कई अनसुलझे सवाल भी खड़े कर दिए हैं।

आमतौर पर नेता मुख्यमंत्री बनने के लिए साजिशें रचते हैं, लेकिन गहलोत का दावा है कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाए रखने और दिल्ली जाने से रोकने के लिए साजिश रची गई। राजनीतिक विश्लेषक इसे 'दिल्ली का सुल्तान' बनने की चाह और 'जयपुर का मोह' न छोड़ पाने की कशमकश का नतीजा मान रहे हैं।

तीन किरदार और 'साजिश' का ताना-बाना

यदि साल 2022 के उस हाई-प्रोफाइल ड्रामे को याद करें, तो इस पूरी पटकथा में तीन मुख्य किरदार नजर आते हैं:

किरदार नंबर 1: दिल्ली के पर्यवेक्षक (खरगे और माकन)

गहलोत का दर्द है कि मल्लिकार्जुन खरगे और अजय माकन बहुत जल्दबाजी में जयपुर आ गए, जिससे उन्हें 'तैयारी' का मौका नहीं मिला। सवाल यह है कि यह तैयारी किस बात की थी? क्या यह आलाकमान के फैसले को पलटने की तैयारी थी?

किरदार नंबर 2: सचिन पायलट गुट

गहलोत का सीधा निशाना सचिन पायलट पर है। उनका कहना है कि विधायकों की नाराजगी उन लोगों से थी जो 'मानेसर' (बगावत के वक्त) गए थे। लेकिन सवाल उठता है कि क्या कोई जूनियर नेता इतना ताकतवर हो सकता है कि वह अपने ही कद्दावर मुख्यमंत्री को जबरन कुर्सी पर बिठाए रखे?

किरदार नंबर 3: खुद गहलोत की 'जादूगर' टीम

क्या यह मुमकिन है कि गहलोत के वफादारों ने ही ऐसी स्क्रिप्ट लिखी जिसमें आलाकमान को जल्दबाज और गहलोत को बेबस दिखाया जा सके?

कुर्सी का मोह या दिल्ली का डर?

अशोक गहलोत आज भले ही खुद को पीड़ित साबित कर रहे हों, लेकिन पूरा देश गवाह है कि जब सोनिया गांधी ने उन्हें दिल्ली बुलाया था, तब शर्त एक ही थी—"एक व्यक्ति, एक पद।"

तथ्य यह है कि गहलोत दिल्ली का ताज भी अपने सिर पर चाहते थे और जयपुर का रिमोट कंट्रोल भी अपने हाथ में रखना चाहते थे। जब यह संभव नहीं दिखा, तो जयपुर में वो 'इस्तीफा ड्रामा' हुआ जिसने कांग्रेस की राष्ट्रीय स्तर पर भद पिटवा दी। पर्यवेक्षक होटल में इंतजार करते रहे और गहलोत समर्थक विधायक शांति धारीवाल के बंगले पर इस्तीफे सौंप रहे थे। राजनीति के जानकार जानते हैं कि बिना मुख्यमंत्री की मौन सहमति के 90 विधायक आलाकमान को आंख नहीं दिखा सकते।

'बड़ी लकीर' और पुरानी टीस

गहलोत ने हाल ही में ज्ञान देते हुए कहा कि "दूसरों की लकीर मिटाने के बजाय अपनी बड़ी लकीर खींचो।" लेकिन पिछले पांच सालों में राजस्थान ने साफ देखा कि सत्ता में रहते हुए किसकी लकीर छोटी करने की कोशिश की जा रही थी—कभी 'नकारा-निकम्मा' बोलकर, तो कभी फाइलें और नियुक्तियां रोककर।

आज जब पासा पलट चुका है, सचिन पायलट राहुल गांधी के करीब हैं और उन्हें छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक बड़ी जिम्मेदारियां मिल रही हैं, तब गहलोत को नैतिकता याद आ रही है। सच तो यह है कि दिल्ली की लकीर पर अब मल्लिकार्जुन खरगे मजबूती से जमे हैं और राजस्थान की कमान पायलट के हाथों में जाती दिख रही है।

टाइमिंग का असली खेल: अब क्यों याद आई 'साजिश'?

वर्तमान में राजस्थान में भाजपा की भजनलाल सरकार है और कांग्रेस विपक्ष में है। ऐसे में गहलोत के इस बयान की टाइमिंग के पीछे गहरी रणनीतिक सोच है:

गहलोत के बयान के पीछे के असल मायने
मार्गदर्शक मंडल का डर: सत्ता जाने के बाद गहलोत को डर है कि कहीं पार्टी उन्हें हाशिए पर न धकेल दे, इसलिए वे चर्चा में बने रहना चाहते हैं।
पायलट की तारीफ से चुभन: राहुल गांधी द्वारा हाल ही में सचिन पायलट और प्रदेश अध्यक्ष की तारीफ करना गहलोत को रास नहीं आया है।
भविष्य की संभावनाएं: यह कहना कि 'मैं रेस में नहीं हूँ लेकिन पार्टी जिम्मेदारी दे तो अलग बात है'—साफ इशारा है कि जादूगर अभी रिटायर होने के मूड में नहीं है।

निष्कर्ष:

गहलोत का सोनिया गांधी से माफी मांगना और आज फिर उसी बगावत को 'साजिश' का नाम देना एक बेहतरीन पॉलिटिकल स्टंट तो हो सकता है, लेकिन पब्लिक सब जानती है। इतिहास गवाह है कि जो नेता वक्त रहते अपनी विरासत सौंपने से कतराते हैं, राजनीति उन्हें अंततः उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां आज अशोक गहलोत खड़े हैं।