नई दिल्ली | 4 मई, 2026 हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम केवल जीत-हार की कहानी ही नहीं कह रहे, बल्कि यह मतदाताओं के बदलते मूड की ओर भी इशारा कर रहे हैं। चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, मतदाताओं ने इस बार NOTA (None of the Above) यानी 'इनमें से कोई नहीं' के विकल्प में बहुत कम रुचि दिखाई है। असम को छोड़ दिया जाए, तो किसी भी अन्य राज्य में नोटा 1 प्रतिशत के आंकड़े को छू भी नहीं सका है।

राज्यों का गणित: असम में सबसे अधिक रुचि

चुनाव परिणामों के विश्लेषण से पता चलता है कि क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरणों के कारण नोटा के इस्तेमाल में विविधता रही है:

राज्यNOTA का प्रतिशत
असम1.29%
पश्चिम बंगाल0.81%
पुडुचेरी0.73%
केरल0.58%
तमिलनाडु0.41%

आंकड़े बताते हैं कि मतदाताओं की प्राथमिकता अब उम्मीदवारों के चयन की ओर अधिक है, न कि उन्हें पूरी तरह नकारने की ओर।

दशक भर का सफर: लगातार गिर रहा है ग्राफ

चुनाव आयोग की पुस्तक 'एटलस-2024' के अनुसार, 2013 में शुरू हुए इस विकल्प का आकर्षण धीरे-धीरे कम हो रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में जहाँ यह 1.08% था, वहीं 2024 के आम चुनाव में यह गिरकर 0.99% पर आ गया। इस साल के विधानसभा चुनावों ने इस गिरावट की पुष्टि कर दी है।

क्या है NOTA और क्यों हुई थी शुरुआत?

नोटा का प्रतीक: एक बैलेट पेपर जिस पर काले रंग का क्रॉस बना होता है।

ऐतिहासिक संदर्भ: सितंबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने इसे EVM में अंतिम बटन के रूप में शामिल किया।

गोपनीयता का अधिकार: इससे पहले, उम्मीदवारों को नकारने के लिए 'फॉर्म 49-O' भरना पड़ता था, जिससे मतदाता की गोपनीयता भंग होती थी। नोटा ने मतदाताओं को बिना अपनी पहचान उजागर किए अपना विरोध दर्ज करने का अधिकार दिया।

नियम की सीमा: हालांकि नोटा एक शक्तिशाली प्रतीकात्मक विकल्प है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि नोटा को सर्वाधिक वोट मिलते हैं, तब भी नए सिरे से चुनाव नहीं कराए जाएंगे। दूसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार को ही विजेता घोषित किया जाएगा।

विशेषज्ञों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नोटा के घटते आंकड़े यह दर्शाते हैं कि मतदाता अब केवल विरोध दर्ज कराने के बजाय सक्रिय रूप से राजनीतिक भागीदारी कर रहे हैं और उपलब्ध विकल्पों में से ही बेहतर चुनने का प्रयास कर रहे हैं।