नई दिल्ली/तेहरान: पश्चिम एशिया में मँडराते युद्ध के बादलों के बीच जहाँ एक ओर कूटनीतिक जीत की चर्चा है, वहीं दूसरी ओर वैचारिक बहस भी तेज हो गई है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने अमेरिकी धमकियों के खिलाफ ईरानी जनता के अटूट साहस की सराहना करते हुए पश्चिमी देशों की 'नैतिकता' पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने ट्रंप प्रशासन द्वारा इस्तेमाल की गई 'सभ्यता के अंत' वाली भाषा को घृणित और अस्वीकार्य करार दिया।
ईरान की 'ह्यूमन चेन' बनाम ट्रंप की 'डेडलाइन'
यह विवाद उस समय चरम पर था जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि यदि 7 अप्रैल की रात 8 बजे तक वार्ता सफल नहीं हुई, तो अमेरिका ईरान की सभ्यता को मिटाते हुए उसके पावर प्लांट्स और बुनियादी ढांचे को नष्ट कर देगा।
इस धमकी के जवाब में ईरानी नागरिकों ने जो किया, उसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया:
मानव श्रृंखला: हजारों ईरानी पुरुष और महिलाएं अपने देश के पावर प्लांट्स और ऊर्जा केंद्रों के चारों ओर ह्यूमन चेन बनाकर खड़े हो गए।
साहस का परिचय: अहवाज के प्रसिद्ध 'व्हाइट ब्रिज' और अन्य रणनीतिक स्थलों पर लोग ढाल बनकर खड़े रहे, ताकि अपने संसाधनों की रक्षा कर सकें।
प्रियंका गांधी का प्रहार: "नफरत नहीं, साहस की जीत"
प्रियंका गांधी ने ईरानी जनता के इस कदम को न्याय की लड़ाई बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर कड़े शब्दों में लिखा:
"पूरी दुनिया देख रही है कि कैसे पश्चिम के चेहरे से तथाकथित नैतिकता का पर्दा हट रहा है। एक तरफ सभ्यताओं को खत्म करने की घृणित भाषा है, तो दूसरी तरफ अपने संसाधनों को बचाने के लिए खड़ी मानव श्रृंखला। नफरत, हिंसा और अन्याय कभी स्थायी नहीं जीतते; अंततः साहस की ही जीत होती है।"
राहुल गांधी ने भी जताई आपत्ति: "परमाणु हथियारों का जिक्र अस्वीकार्य"
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी राष्ट्रपति ट्रंप के लहजे की आलोचना की। उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक युग में 'सभ्यता के विनाश' जैसी कल्पना करना ही गलत है। राहुल गांधी ने जोर देकर कहा कि परमाणु हथियारों के प्रयोग की धमकी किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराई जा सकती।
तबाही से ठीक 2 घंटे पहले टला युद्ध
गौरतलब है कि यह दो हफ्ते का सीजफायर उस समय हुआ जब तबाही की समय-सीमा (डेडलाइन) खत्म होने में मात्र 2 घंटे बचे थे।
अंतिम क्षणों में नरमी: ट्रंप प्रशासन ने अंतिम समय में रणनीतिक बदलाव करते हुए सीजफायर पर हस्ताक्षर किए।
राहत की लहर: इस फैसले ने न केवल ईरान बल्कि इजरायल और पूरे मध्य पूर्व को एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की आग में झुलसने से बचा लिया है।
विश्लेषण: कूटनीति के साथ बदला जनमत
जानकारों का मानना है कि ईरानी जनता के सड़क पर उतरने और वैश्विक स्तर पर (भारत जैसे देशों से) आ रही प्रतिक्रियाओं ने अमेरिका पर नैतिक दबाव बनाया। 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में होने वाली वार्ता अब केवल दो देशों का मुद्दा नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं—'सैन्य शक्ति बनाम जन-साहस'—के बीच के संतुलन की परीक्षा होगी।





