नई दिल्ली।

तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों द्वारा अचानक नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी (NCPI) में विलय की घोषणा के बाद देश के सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। इस बेहद जटिल और संवेदनशील मामले में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला कोई भी जल्दबाजी करने के मूड में नहीं हैं और हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा अध्यक्ष संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले इस मामले पर अपना अंतिम फैसला सुना सकते हैं। हालांकि, कोई भी निर्णय लेने से पहले वे दोनों पक्षों की दलीलें खुद सुनेंगे और मामले को कानूनी रूप से पुख्ता करने के लिए केंद्रीय कानून मंत्रालय से राय भी लेंगे।

दोनों पक्षों को नोटिस; ममता गुट से मांगा जवाब

इस बड़े राजनीतिक संकट के बीच, स्पीकर दफ्तर ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले मूल टीएमसी गुट को एक आधिकारिक ईमेल भेजा है। इस ईमेल के जरिए पार्टी नेतृत्व से पूरे मामले पर उनका रुख और राय मांगी गई है। माना जा रहा है कि बागी सांसदों और मूल पार्टी दोनों को ही स्पीकर के सामने अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाएगा।

फैसले को कानूनी रूप से 'अभेद्य' बनाने की तैयारी

सूत्रों का कहना है कि स्पीकर ओम बिरला इस पूरे विवाद पर केंद्रीय कानून मंत्रालय से लिखित कानूनी राय मांग सकते हैं। कानून मंत्रालय इसके लिए देश के शीर्ष सरकारी वकीलों और वरिष्ठ कानून अधिकारियों से सलाह-मशविरा करेगा। इस कसरत का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्पीकर का फैसला संवैधानिक और कानूनी रूप से इतना मजबूत हो कि भविष्य में यदि इसे अदालत (कोर्ट) में चुनौती दी जाए, तो वह खारिज न हो सके।

संविधान विशेषज्ञों ने उठाए सवाल: क्या सांसदी बचेगी?

इस बीच, कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों ने बागी गुट के इस कदम की वैधता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

पार्टी का विलय होता है, सांसदों का नहीं: लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य ने संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि नियम के मुताबिक केवल एक राजनीतिक पार्टी ही दूसरी पार्टी में मिल सकती है। सांसद या विधायक खुद अपनी मर्जी से पार्टी के विलय का फैसला नहीं कर सकते, यह अधिकार केवल पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के पास होता है।

कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं: चुनाव आयोग के एक पूर्व अधिकारी ने इसे 'अनोखा प्रयोग' बताते हुए कहा कि दलबदल विरोधी कानून या जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) में सांसदों द्वारा इस तरह किसी अनजान पार्टी को टेकओवर करके विलय करने का कोई जिक्र या प्रावधान नहीं है।

'हम एनडीए का हिस्सा बनेंगे' — बागी गुट

यह पूरा विवाद रविवार को तब शुरू हुआ जब बागी सांसदों ने अचानक एक अज्ञात सी पार्टी 'NCPI' में विलय का एलान कर दिया। बागी गुट की अध्यक्ष चुनी गईं काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया कि टीएमसी के दो-तिहाई (20 सांसदों) ने स्पीकर को संसद में अलग बैठने की व्यवस्था के लिए पत्र सौंप दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे NCPI में शामिल हो रहे हैं और केंद्र की एनडीए (NDA) सरकार का समर्थन करेंगे।

क्या है NCPI का वजूद?

जिस नेशलिस्ट सिटीजन्स पार्टी (NCPI) के सहारे बागी सांसद अपनी सदस्यता बचाना चाहते हैं, उसका रजिस्ट्रेशन जनवरी 2023 में पश्चिम बंगाल के हावड़ा से हुआ था। भारतीय राजनीति में इस पार्टी का अब तक कोई बड़ा वजूद या प्रभाव नहीं रहा है।

अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या 20 सांसदों का यह दांव उनकी सांसदी बचा पाएगा, या फिर ममता बनर्जी का गुट उन्हें अयोग्य ठहराने में सफल रहेगा। फिलहाल सबकी नजरें स्पीकर ओम बिरला के फैसले पर टिकी हैं।