कोलकाता | राज्य ब्यूरो पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद प्रशासनिक नियुक्तियों का दौर शुरू हो गया है, लेकिन मुख्य सचिव के पद पर मनोज अग्रवाल की तैनाती ने एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। TMC का आरोप है कि यह नियुक्ति हालिया विधानसभा चुनावों में 'मदद' के बदले दिया गया एक 'इनाम' है।
TMC के तीखे प्रहार: "क्या चुनाव स्वतंत्र थे?"
तृणमूल कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने सोशल मीडिया के जरिए चुनाव आयोग और BJP सरकार की मिलीभगत का आरोप लगाया है:
साकेत गोखले (सांसद, TMC): उन्होंने इस कदम को 'बेशर्मी की हद' बताते हुए सवाल किया कि जो अधिकारी चुनाव की निष्पक्षता का जिम्मा संभाल रहा था, उसे ही सरकार के सबसे ऊंचे पद से नवाजना क्या चुनावों की चोरी की पुष्टि नहीं करता?
सागरिका घोष (सांसद, TMC): उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि क्या अब भी कोई मानता है कि 2026 के बंगाल चुनाव स्वतंत्र थे? एक 'निष्पक्ष अंपायर' को शीर्ष नौकरशाह बनाना लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है।
नियुक्ति का घटनाक्रम और दिलचस्प तथ्य
कैबिनेट का फैसला: यह घोषणा मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की पहली कैबिनेट बैठक के बाद की गई।
सलाहकार की नियुक्ति: अग्रवाल की नियुक्ति से महज 48 घंटे पहले पूर्व विशेष चुनाव पर्यवेक्षक सुब्रत गुप्ता को मुख्यमंत्री का सलाहकार नियुक्त किया गया था।
पुरानी पृष्ठभूमि: दिलचस्प बात यह है कि मनोज अग्रवाल को CEO पद के लिए तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार ने ही पैनल में शामिल किया था, जिन्हें बाद में चुनाव आयोग ने चुना था।
BJP का बचाव: "हमने नियमों का पालन किया"
विपक्ष के हमलों के बीच भारतीय जनता पार्टी ने इस फैसले का पुरजोर समर्थन किया है:
वरिष्ठता का तर्क: BJP ने स्पष्ट किया कि मनोज अग्रवाल 1990 बैच के सबसे वरिष्ठ IAS अधिकारी हैं और उनकी नियुक्ति पूरी तरह से सेवा नियमों (Service Rules) के अनुरूप है।
विपक्ष पर पलटवार: पार्टी ने कहा कि पिछली ममता सरकार के विपरीत, वर्तमान सरकार योग्यता और वरिष्ठता के आधार पर फैसले ले रही है।
रिटायरमेंट और एक्सटेंशन की संभावना
मनोज अग्रवाल 31 जुलाई को अपनी सेवा से सेवानिवृत्त (Retire) होने वाले हैं। हालांकि, प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि राज्य सरकार की सिफारिश पर केंद्र उन्हें छह महीने का सेवा विस्तार (Extension) दे सकता है, ताकि नई सरकार के शुरुआती कामकाज में निरंतरता बनी रहे।
निष्कर्ष
बंगाल की राजनीति में अधिकारियों की भूमिका हमेशा से चर्चा का विषय रही है। जहां एक तरफ विपक्ष इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर प्रहार बता रहा है, वहीं सरकार इसे प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण की दिशा में उठाया गया कदम मान रही है। आने वाले दिनों में यह विवाद अदालती गलियारों तक भी पहुँच सकता है।
टिप्पणी: मुख्य सचिव जैसे संवैधानिक और प्रशासनिक गरिमा वाले पद पर ऐसी नियुक्तियां अक्सर विवादों को जन्म देती हैं, खासकर जब अधिकारी का पिछला पद चुनाव जैसे संवेदनशील विभाग से जुड़ा हो। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या केंद्र सरकार इनके सेवा विस्तार को मंजूरी देती है।





