रांची।अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की 7 व 8 अगस्त 1942 की बैठक में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ। उस समय सूचना तकनीक आज की तरह सशक्त नहीं थी,लेकिन इसके बाद भी 9 अगस्त 1942 से पूरे देश में क्रांति की लहर दौड़ गयी है। ब्रिटिश हुकूमत से बिना डरे हुए स्वतंत्रता के मतवालों ने सरकारी कार्यालयों में तिरंगा फहराया, जुलूस, प्रदर्शन और सभाएं की, कई स्थानों पर आगजनी की घटनाएं हुई, टेलीग्राम और टेलीफोन लाइन तथा बिजली के तार काट कर अंग्रेजी शासन को खुली चुनौती दी गयी।स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे अहम लड़ाई में राज्य में कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने गोलियां चलायी और इसमें कई स्वतंत्रता सेनानियों की जान चली गयी।आजादी के मतवालों सैकड़ों सेनानियों को गिरफ्तार कर लिया गया।जेल में दी गयी यातनाओं से भी कई स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी कुर्बानी दे दी। इस दौरान अनेक स्थानों पर आंदोलनकारियों ने समानांतर शासन स्थापित करने की कोशिश की।



1942 की क्रांति के दौरान झारखण्ड के कुछ हिस्सों में ऐसी राजनीतिक घटनाएं घटी थी,जिससे अंग्रेजी सरकार के पैरों तले की जमीन खिसकने लगी थी। गांधी जी के भारत छोड़ो आंदोलन के आह्वान साथ दूसरे ही 9 अगस्त को राज्य के स्थानीय सरकारी भवनों, डाकघर, डाकबंगले, स्टेशन, क्लब पर कांग्रेस के झंडे फहराये गए। उस समय हजारीबाग जिला आंदोलन में सबसे आगे रहा। संत कोलंबा कॉलेज परिसर आंदोलन का केंद्र बन गया। छात्र खुलकर आंदोलन के समर्थन में सड़क पर उतर गए थे। शहर में जुलूस पर प्रतिबंध के बाद भी प्रदर्शन और सभाएं आयोजित हुई। आंदोलन में भाग लेने के कारण जगदीश राम और डा0 त्रिवेणी प्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया, वहीं हजारीबाग जिले के गिरिडीह में तीन प्रमुख कांग्रेसी नेता राजन सिंह, अजीत कुमार बाग और जग्रनाथ सहाय को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।इससे आंदोलन कम होने के बजाय और तेज हो गया। डुमरी थाना पर आक्रमण करने तथा संथालों को उकसाने के जुर्म में अनन्तलाल और कारू राम को गिरफ्तार कर लिया गया। जबकि धनवार थाने पर झंडा फहराने का प्रयास करते हुए छट्ठु ठठेरा, नारायण मोदी, लेखी राय और पुनीत राय को गिरफ्तार कर लिया गया। वहीं एकीकृत हजारीबाग जिले के चतरा में नरसिंग भगत के नेतृत्व में एक जुलूस में अनुमंडल पदाधिकारी के कार्यालय भवन पर झंडा फहरा दिया। भागु मांझी स्थानीय डाक घर पर राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया। वहीं हंटरगंज थाना क्षेत्र में चौकीदारी, टैक्स देना बंद कर दिया। कोडरमा में छट्टु राम, होरिल राम आंदोलन का संचालन करते थे। उनके संस्थान से पच्चासों लोग गिरफ्तार हुए। यहां एक जुलूस ने एक स्टेशन पर आग लगा दी। गिरफ्तार लोगों को कोड़ो से पीटा गया। इसी आंदोलन के क्रम में 19 नम्बर को हजारीबाग केन्द्रीय कारा में 6 कैदी दीवार फांद कर फरार हो गये। भागने वाले कैदी में जयप्रकाश नारायण, रामानंद मिश्र, योगेन्द्र शुक्ल, सुरज नारायण सिंह, शालीग्राम सिंह तथा गुलाबी सोनार शामिल थे।



1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में पलामू की भी खास भूमिका रही।कुमारी रमेश्वरी सरोज दास को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भाषण देने के लिए सजा दी गई। न्यायालय भवन पर राष्ट्रीय झंडा फहराने के प्रयास में छात्रों के उपर लाठी चार्ज हुई। मुंड के भरतमन, शहरपुर के नारायण साह और लेशलो गंज के रामेश्वर तिवारी को छह-छह माह की कड़ी सजा दी गई। जपला सिमेंट फैक्ट्री के श्रमिक नेता मिथिलेश कुमार सिन्हा ने हड़ताल करा दी। श्रमिकों ने भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेने का व्रत लिया। डालटेंनगंज में रेल तार व्यवस्था भंग कर दी गई। गढ़वा में विद्यार्थियों ने सरकारी भवनों पर झंडा फहराया। छात्र नेता रामकिशोर तेली, गोपाल प्रसाद, गौरीशंकर और विश्वनाथ गिरफ्तार हुए। लातेहार क्षेत्र में टाना भगतों ने गिरफ्तारियां दी। जेठन सिंह खरवार, गुरो साह, नकछेदी कहार, भगीरथ सिंह खरवार, दुलारचंद प्रसाद और भुवनेश्वर प्रसाद को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

सिंहभूम में भारत छोड़ो आन्दोलन के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। 9 अगस्त की सूचना जमशेदपुर में मिल गई। त्रेता सिंह और जोन के नेतृत्व में टाटा वर्कस यूनियन ने हड़ताल कर दी और कांग्रेस को पूर्ण सहयोग देने का संकल्प लिया गया। 15 अगस्त को बीपी सिन्हा को गिरफ्तार कर लिया गया। टाटा के श्रमिकों को भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित करने के आरोप में 19 अगस्त को एम.डी. मदन को गिरफ्तार कर लिया गया। सरकार की दमनात्मक कार्रवाईयों के कारण सफाई कर्मचारियों ने भी हड़ताल कर दी। सरकारी भवनों, शराब की दुकानों, सड़क, रेल, तार, टेलिफोन सभी संचार के साधनों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। छात्रों तथा मजदूरों ने चाईबासा में जुलूस निकाला और देश को आजादी दिलाने की प्रतिज्ञा ली।



भारत छोड़ो आंदोलन का संताल परगना प्रमंडल भी एक अहम प्रमुख केंद्र रहा। आंदोलनकारियों ने 13अगस्त 1942 को कचहरी में कांग्रेसी झंडा फहराया, 13 से 14 अगस्त को आंदोलनकारियों ने रेल की पटरियों, सिग्नल, बिजली तार एवं टेलीफोन लाइनों को नष्ट कर दिया। कई सरकारी भवनों को नुकसान पहुंचाया।आंदोलनकारियों ने देवघर अनुमंडल में समानांतर सरकार की स्थापना की। दुमका में उपायुक्त कार्यालय पर कांग्रेसी झंडा फराया गया। 25 अगस्त को अलुवेरा में डाक बंगला और वन विभाग के भवनों को जला डाला।

अगस्त क्रांति के दौरान झारखंड के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए ब्रिटिश शासन की ओर से न सिर्फ बल का प्रयोग किया गया, बल्कि निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां भी बरसायी गयी। इसी क्रम में जब कोडरमा के अबरख खानों में काम करने वाले मजदूरों ने झुमरी तिलैया में जुलूस निकाला, तो उन पर गोलियां चली गयी। हजारीबाग के डोमचंच में भी एक जुलूस पर गोली चलायी गयी, जिसमें 2 के मरने और 22 घायल होने की बात सामने आयी। टाटा में भी 30अगस्त 1942 को मशीन गनों से गोलियां दागी गयी। संताल परगना प्रमंडल में बादलमल पहाड़िया नामक एक नौजवान युवक अपनी मां का एकमात्र पुत्र था, वह भी बड़े ही उत्साह के साथ आंदोलन में कूद पड़ा, पर फिर वह घर वापस नहीं लौट पाया। गोड्डा जेल में ही पुलिस की यातनाओं के कारण वह शहीद हो गया। एक विशेष फौजी टुकड़ी ने दुमका में भी गोलीबारी की,जिसमें त्रिगुनानंद मारे गये।इस आंदोलन के दौरान झारखंड के विभिन्न हिस्सों से दो हजार से अधिक लोगों की गिरफ्तारी हुई।