वाराणसी।बाबा भोलेनाथ की नगरी काशी कोटि-कोटि शिवलिंगों की दिव्य आभा से प्रकाशित है।तरह तरह के शिवलिंग अपनी अलग-अलग महत्ता के साथ विराजमान हैं।इनमें से कुछ मंदिर में में है तो कुछ मंदर में है कोई गंगा में है तो कोई सरोवरों के तट पर तो कोई कूप के अंदर में विराजता है।जो शिवलिंग जहां है वहीं से अपने भक्तों पर कृपा बरसाते है। बुखार पीछा नहीं छोड़ रहा हो तो अपनी श्रद्धा के अनुसार ज्वर हरेश्वर महादेव की डेहरी पर जाकर माथा टेक कर अपनी आमद दर्ज कराइए,अगर कर्ज का बोझ कमर तोड़ रहा है तो परम प्रभु ऋण हरेश्वर की शरण में पहुंच जाइए।
असाध्य रोगों से मुक्ति की कामना हो या अकाल मृत्यु का डर सता रहा हो तो मध्यमेश्वर तीर्थ में महामृत्युंजयेश्वर के नाम से आसन जमाए बैठे नीलकंठ के कपाट जाकर खटखटाइये,मुकदमों के दलदल में धसते जा रहे हों तो आर्त स्वर में आवाज लगाइए कहीं सुनवाई न हो रही हो तो हर फरियाद की सुनवाई के लिए स्वयंभू विश्वेश्वर का दरबार सबके लिए खुला है।छत्रपों के रूप में ओंकारेश्वर व केदारेश्वर की महिमा के साथ अमृतमय पुण्यफल घुला हुआ है।
शिवतत्व की आभा से लवरेज इन सभी शिवलिंगों के बीच एक ऐसा दिव्य शिवलिंग भी है जो पंचगंगा तीर्थ क्षेत्र के प्राचीन शीतला घाट पर स्थापित है जो भक्तों द्वारा श्रद्धेय अतिथि के रूप में नाना-विधि सेवाएं पाते हैं।
मूलरूप से लाहौर (पाकिस्तान) निवासी होने के कारण बाबा भोलेनाथ की नगरी काशी में अतिथि देव पाकिस्तनिया महादेव के नाम से जाने जाते हैं।नगर निगम के अभिलेखों में भी इसी नाम से इनकी पहचान अंकित है।नई पीढ़ी भले ही इनके इतिहास से अनजान हो लेकिन बुजुर्गों की यादों में लाहौर से यहां आकर बसे अतिथि शिवलिंग की यात्रा कथा आज भी श्रद्धा की स्याही से अंकित है।
बात सन 1947 के दौर की है। देश हिंदुस्तान पाकिस्तान के बटवारे की आग में जल रहा था।सीमा पार स्वघोषित पाकिस्तान में हिंसा और विध्वंस का भीषण तांडव चल रहा था।इसी तांडव के बीच लाहौर के दो हिंदू सगे भाई हीरा व्यापारी जमुनादास और निहाल चंद को भी लाहौर छोड़ना पड़ा।ये दोनों व्यापारी हिंदुस्तान आते समय जो माल साथ ला सकते थे ले आए और साथ में छुपा कर लाए अपने कुटुंब के इष्ट स्वयं लाहौरी महादेव को जिनका मंदिर लाहौर में ध्वस्त कर किया जा चुका था।दोनों भाई किसी तरह अपनी जान बचाकर हिंदुस्तान पहुंचे उस समय स्वतः निराश्रित थे।शिवलिंग की पुनर्प्रतिष्ठा की कोई गुंजाइश नहीं बन पा रही थी। दोनों भाइयों ने फैसला किया कि शिवलिंग को शिव नगरी काशी की गंगा में विसर्जित कर दिया जाए। वे लोग जब प्राचीन शीतला घाट पर विसर्जन का उद्यम कर रहे थे तो उसी समय घाट पर मौजूद काफी देर से दोनों परदेसियों की गतिविधि भांप रहे बुंदिराज परिवार के सदस्य राजा गोपालचन्द ने दोनों भाइयों को अपने पास बुलाया और व्यथा-सुनी और विसर्जन करने से रोका।बाद में राजा साहब ने दोनों भाइयों के संक्षिप्त काशी प्रवास के दौरान ही शीतला घाट की सीढ़ियों पर ही एक छोटा सा शिवालय बनवाकर इस शिवलिंग को अरघे में प्रतिष्ठित कर दिया और इसी के साथ बाबा भोलेनाथ की नगरी काशी के हजारों शिवालयों की सूची में एक और शिवालय जुड़ गया।भगवान विश्वनाथ के औचक अतिथि के रूप में प्रतिष्ठित हो गए लाहौरी बाबा।पाकिस्तनिया महादेव के नाम से ये देवस्थान प्रसिद्ध हुआ।अब भी उनकी अभ्यर्थना एक श्रधेय अतिथि के ठाठ बाट के साथ ही होती है।
वर्तमान में मंदिर के गर्भगृह के चारों कोनों पर स्थापित चार देव विग्रहों की सेवा से पूजित हैं अपने लाहौरी बाबा। श्वेत-श्याम आभा वाले काशी के इस अनूठे शिवलिंग को हरि (विष्णु) व हर (शिव का) सायुज्य स्वरूप माना जाता है। इसी भावना से कार्तिक मास की देवोत्थान एकादशी के दिन शिवलिंग हरिहर स्वरूप में भक्तों की विशेष पूजा पाता है।





