कृष्ण बिहारी मिश्र।हमेशा याद रखें कि जैसे जमीन पर पड़े टेढ़ेमेढ़े लोहे के कीलों को भी चुम्बक अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। ठीक उसी प्रकार सद्गुरु और ईश्वर भी अपने परमभक्तों को स्वयं में समेट लेते हैं।परमहंस योगानन्द जी ऐसे ही सद्गुरु हैं, बस उनकी बातों को मानिए,उनके बताये मार्गों पर चलिए,ध्यान करिए,क्रियायोग को अपनाइए।फिर आप स्वयं देखेंगे कि आपका जीवन आध्यात्मिक पथ पर किस गति से दौड़ रहा है। ये बातें योगदा सत्संग मठ में योगदा भक्तों को ब्रह्मचारी प्रह्लादानन्द ने कही।





जगद्गुरु शंकराचार्य ने भगवान द्वारा हमें दिए गए तीन दुर्लभ आशीर्वादों का उल्लेख किया है: पहला मानव शरीर पाना, दूसरा ईश्वर साक्षात्कारी गुरु प्राप्त करना और तीसरा ईश्वर को पाने की चाहत रखना। हमें किसी भी अन्य वस्तु से अधिक ईश्वर की इच्छा क्यों करनी चाहिए,क्योंकि ईश्वर को पाने से स्थायी खुशी मिलती है न कि अस्थायी खुशी।जैसा कि भौतिक चीजें देती हैं। ईश्वर की प्राप्ति से भी संतुष्टि मिलती है जो भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति से नहीं मिल सकती।





ईश्वर एक चुंबक है और वह हमेशा हमारे बीच में रहता है और उस चुंबकीय ईश्वर की ओर आकर्षित होने के लिए हमें चुंबकीय गुण विकसित करना चाहिए और वह है ईश्वर के लिए लालसा,ईश्वर की इच्छा ताकि हम न केवल आकर्षित हों बल्कि ईश्वर से चिपके भी रहें।





गुरुजी ने कहा वह क्या है जो हमें ईश्वर के प्रति इस इच्छा को विकसित करने से रोक रहा है,लेकिन उसे खोजने की इच्छा इंद्रिय सुखों में लिप्त होने की इच्छा में डूब जाती है। जब वह संवेदी मजबूरी गायब हो जाती है तो भगवान के लिए लालसा अपने आप प्रकट हो जाती है।इसलिए जब तक इंद्रिय सुख हमारी चेतना में सर्वोपरि हैं तब तक हम इंद्रियों में व्यस्त रहते हैं और भगवान हमसे छिपे रहते हैं,लेकिन जब भक्त को एहसास होता है और वह इंद्रिय भोग पर निर्भरता को कम करने के लिए प्रयास करता है तो उसके अंदर भगवान की इच्छा फिर से प्रकट हो जाती है।अब सवाल आता है कि उनके साथ कैसे जुड़ें। स्पष्ट है कि हमारे गुरु की शिक्षाओं का पालन कर, उनकी बात मानकर, उनके द्वारा हमें दिये गये इस मार्ग के प्रति निष्ठावान बनकर, हम उनसे जुड़ सकते हैं।





ब्रह्मचारी प्रह्लादानन्द ने कहा कि आइए अब कुछ व्यावहारिक तरीकों पर नजर डालें जो इस गुणवत्ता को विकसित करने में हमारी मदद कर सकते हैं। ध्यान द्वारा इस गुण को विकसित करें। यदि आपके मन में ईश्वर के प्रति गहरी इच्छा नहीं है तो ईश्वर स्मरण की ये क्रियाएं यांत्रिक हो सकती हैं। परमहंस योगानन्द ने कहा था कि ऐसी दृढ़ इच्छा ही ईश्वर की खोज के प्रयास में सफलता प्राप्त करने हेतु महानतम कारक है।लेखक बिहार-झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार एवं विद्रोही 24 के संपादक हैं।