देहरादून / नई दिल्ली

उत्तराखंड हिमालय की हसीन वादियों और शांत पहाड़ियों के नीचे भूगर्भीय हलचल का एक बड़ा संकेत सामने आया है। एक हालिया वैज्ञानिक अध्ययन में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि उत्तराखंड हिमालय के नीचे हर 100 साल में 8.1 तीव्रता के विशालकाय भूकंप के बराबर ऊर्जा लगातार जमा हो रही है।

तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन को 02 अक्टूबर को यूरोपीय भूविज्ञान संघ (EGU) ने शोध सार के रूप में ऑनलाइन प्रकाशित किया है। यह अध्ययन भारतीय टेकअॉनिक प्लेटों के भीतर संचित हो रहे अत्यधिक तनाव को रेखांकित करता है।

क्यों जमा हो रही है इतनी ऊर्जा? (मुख्य हिमालयी थ्रस्ट में अटकाव)

शोधकर्ता दिब्यशक्ति पांडा और उनके सहयोगियों ने इस अध्ययन के लिए सैटेलाइट पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) और रडार उपग्रहों से प्राप्त उच्च-स्तरीय आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया।

  • 115 किमी चौड़ा अवरुद्ध क्षेत्र: अध्ययन से पता चला है कि भारतीय प्लेट और हिमालय के बीच स्थित मुख्य हिमालयी थ्रस्ट (MHT) का लगभग 115 किलोमीटर चौड़ा हिस्सा पूरी तरह से 'अवरुद्ध' (Locked) है।
  • 18 मिमी का खिसकाव-अंतर: थ्रस्ट पर हर साल लगभग 18 मिलीमीटर का 'स्लिप-डेफिसिट' (खिसकाव-अंतर) दर्ज किया गया है। इसका अर्थ यह है कि प्लेटों की अपेक्षित स्वाभाविक गति और भ्रंश पर वास्तविक खिसकाव के बीच एक बड़ा अंतर बना हुआ है, जिसके कारण ऊर्जा बाहर निकलने के बजाय अंदर ही कैद हो रही है।
  • ज़मीन का उठना: उपग्रह रडार डेटा के अनुसार, जमीन का अधिकतम ऊर्ध्वाधर उठाव (Vertical Uplift) भी प्रति वर्ष 4 से 6 मिलीमीटर दर्ज किया गया है।

वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किए गए भूगर्भीय मॉडल से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि उत्तराखंड हिमालय के नीचे प्लेटों के बीच बहुत मजबूत जुड़ाव है, जो लगातार भूगर्भीय तनाव को बढ़ा रहा है।

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क्या हर 100 साल में बड़ा भूकंप आना तय है?

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि अध्ययन में व्यक्त 8.1 तीव्रता का आंकड़ा केवल ऊर्जा संचय का भूगर्भीय अनुमान है, न कि भूकंप के आगमन का कोई निश्चित टाइम-टेबल या भविष्यवाणी।

शोधकर्ताओं ने यह दावा बिल्कुल नहीं किया है कि अगला बड़ा भूकंप कब आएगा या उसकी सटीक तीव्रता क्या होगी। यह संचित ऊर्जा एक ही बार में बड़े भूकंप के रूप में निकल सकती है या फिर छोटे-छोटे झटकों के रूप में भी धीरे-धीरे रिलीज हो सकती है।

उत्तराखंड में बड़े भूकंपों का काला इतिहास

उत्तराखंड और गढ़वाल का क्षेत्र संवेदनशीलता के मामले में हमेशा से ही अति-जोखिम वाले ज़ोन में रहा है। अतीत में भी इस क्षेत्र ने तबाही के कई मंजर देखे हैं:

वर्षभूकंपतीव्रता (मैग्नीट्यूड)
1803गढ़वाल भूकंप7.8
1991उत्तरकाशी भूकंप6.8
1999चमोली भूकंप6.4

हिमालयी क्षेत्र में बढ़ता तनाव इस बात की सख्त ताकीद करता है कि हमें आपदा प्रबंधन, भूकंप-रोधी बुनियादी ढांचे और त्वरित निगरानी प्रणालियों को अत्यधिक मजबूत करने की आवश्यकता है। यद्यपि समय का सटीक अनुमान लगाना प्रकृति के नियमों के अधीन है, लेकिन वैज्ञानिक आंकड़े सतर्कता और पूर्व तैयारियों के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं।

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