झारखंड की राजधानी रांची से 15 किलोमीटर की दूरी पर पिठौरिया इलाका है और ये इलाका विकास की बाट जोह रहा है।पिठौरिया नदी के किनारे बसे हुए लोग कई सालों से पुल बनने की बाट जोह रहे हैं।पुल के न होने की वजह से लोगों को अपनी जान जोखिम में डालकर नदी को पार करना पड़ता है। बारिश के दिनों में लोगों को दूसरे क्षेत्रों में जाने के लिए नदी में उतर कर जाना पड़ता है। रहड़ा पंचायत के अंतर्गत आने वाले गांव, कतरिया बेडा, महुआ, जारा, कौआ और टोंगरी सहित कई गावों के लोग सरकार से पुल बनाने की मांग कर रहे हैं।



लोगों की कई सालों से जारी मांग के बाद भी अभी तक नदी पर पुल नहीं बन पाया है। इन गांवों के कई लोग नदी में उतरने की वजह से अपनी जान को गंवा चुके हैं और हमेशा यहां पर दुर्घटना की संभावना बनी रहती है।इन गांवों के लोगों का दर्द विकास विभाग बाखूबी नजर अंदाज कर रहा है।नेता वोट मांगने तो यहां आ जाते हैं, लेकिन फिर झांकने नहीं आते।



आपको बता दें कि उफनती पिठौरिया नदी के उस पार 7 से 8 गांव राड़हा पंचायत के तहत पड़ते हैं। जंगलों के बीच से नदी को पार करके ही इन गांवों के लोग मुख्य सड़क तक पहुंच पाते हैं। महिलाएं, बच्चों और बुजुर्गों को भी जरूरतों के लिए ऐसे ही नदी में उतरकर उस पार जाना पड़ता है।उफनती और भारी बारिश के मौसम में यहां खतरा कई गुना बढ़ जाता है।



रात में किसी भी आपात हालत में लोगों को इसी तरह से नदी पार करना पड़ता है। स्थानीय गांव के चमड़ा मुंडा कहते हैं कि नदी का जलस्तर कभी-कभी इतना बढ़ा जाता है कि नदी पार करना बेहद मुश्किल हो जाता है।अस्पताल तक पहुंचने से पहले ही लोगों की मौत हो जाती है।यह आलम तब है, जब रांची से इस क्षेत्र की दूरी महज 15 किलोमीटर है।



इन गांवों के लोगों का कहना है कि यहां पुल बनाने की मांग सालों से हो रही है। लोगों की मांग को न तो अधिकारी सुनते हैं न ही नेता।चुनाव जीते हुए नेता यहां लोगों का हाल तक जानने नहीं आते है। नेता 2019 से पहले यहां आए थे लेकिन उसके बाद किसी ने यहां आने के बारे में नहीं सोचा।

सविता देवी और गांव की ही अन्य महिलाओं ने कहना है कि बच्चों को पीठ पर बांधकर नदी पार करने में उन्हें काफी डर लगता है लेकिन इसके अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है।यूं ही लोगों की जिंदगी कट रही है।पुल अगर यहां बन जाता तो बाजार और मुख्य सड़क तक पहुंचने में उन्हें आसानी होगी।



नदी के आस-पास बसे गांवों की घनी आबादी है। करीब 4,000 लोग कटारिया बेड़ा, महुआ जाड़ा और अन्य गांवों में रहते हैं। यूं तो नदी पार करने के लिए उन्हें सालभर संघर्ष ही करना पड़ता है लेकिन बारिश के दिनों में जिंदगी बदतर हो जाती है।इन गांवों के लोग प्रशासन की उपेक्षा से बदहाल और व्यथित हैं।

ग्रामीण विकास विभाग के मंत्री आलमगीर आलम ने इस विषय पर कहा है कि वे जांच कराएंगे, फिर जल्द ही पुल बनवाने की पहल शुरू करेंगे।जब हालात राजधानी से कुछ किलोमीटर की दूरी पर ऐसे हैं तो दूरस्थ क्षेत्रों में होने वाले विकास के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है।