प्रतिनिधि,बलियापुर। बलियापुर के एसजीएम स्कूल में शुक्रवार को सरहुल महोत्सव का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम शिक्षक स्वपन कुमार महतो एवं प्रेम महतो ने साल के डाली का पूजन करने के बाद अपने देवा–भूता और राई–रईया को आव्हान कर साल (सखुआ) की डाली को प्रखंड उप प्रमुख आशा देवी एवं स्कूल की प्राचार्य कंचन महतो के द्वारा गाड़ा गया। इसके बाद छात्र-छात्राओं द्वारा आकर्षक झूमर गीत नृत्य प्रस्तुत किया गया। सभी ने पारंपरिक पोशाक पहने हुए थे।





इस अवसर पर प्रखंड उप प्रमुख आशा देवी ने सरहुल के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सरहुल आदिवासियों का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है और यह दो शब्दों के में से बना है–सर+हुल। सर यानि सरई या सखुआ का वृक्ष और हुल यानि क्रांति या बदलाव है। इस तरह पतझड़ के बाद बसंत ऋतु के आगमन के साथ ही सखुआ के पेड़ पर नए नए पत्तों और फूलों का आगमन हो जाता है, जिससे पूरे जंगल क्षेत्र में प्राकृतिक क्रांति और बदलाव देखने को मिलता है,जिसे सरहुल कहा जाता है। संथाली, मुंडारी और हो भाषा में सरहुल को बा अथवा बाहा परब, खड़िया में जाकोर, कुदुख में खदडी तथा कुड़मालि, नागपुरी, खोरठा आदि भाषा में सरहुल को फूल परब कहा जाता है।मुख्यत: सरहुल परब प्रकृति और सृजन शक्ति को समर्पित है।आदिवासियों का मानना है कि इस परब को मनाये जाने के बाद नई फसल का उपयोग शुरू किया जा सकता है। सरहुल मुख्यत: फूलों का त्यौहार है। इस दौरान आदिवासी महिलाएं लाल पाड़ वाली सफेद साड़ी पहनती है। सफेद सादगी और शुद्धता का प्रतीक है तथा लाल रंग संघर्ष का प्रतीक है। साथ ही सफेद सिंगबोंगा का और लाल बुरु बोंगा का प्रतीक है।





कार्यक्रम में प्राचार्या कंचन महतो ने आदिवासी समाज और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण त्योहार बताया। उन्होनें कहा कि आज के वैश्विक सांस्कृतिक युग में आदिवासी संस्कृति पर संकट मंडरा रहा है। आज उनके संस्कृति को सहेजने की जरूरत है और ऐसे कार्यक्रम से आदिवासी संस्कृति को बढ़ावा देने और संरक्षित किया जा सकता है।





मौके पर दिवाकर महतो, अजय बसरियार, स्वपन बसरियार, दिनेश महतो, अनीता महतो, अनीता स्वर्णकार, तुलसी महतो, राजन रजक, मृत्युंजय महतो, अरुण कुमार, मंटु रजवार, धरमबीर कुमार, अमल नाथ महतो, टुम्पा कुमारी, रूपाली कुमारी, काजल कुमारी आदि उपस्थित थे।