नई दिल्ली / तेहरान:
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच एक अत्यंत गंभीर और नया डिजिटल संकट मंडराने लगा है। अगर अमेरिका या इस्राइल ईरान पर दोबारा सैन्य हमला करते हैं, तो ईरान ने इसके जवाब में फारस की खाड़ी और रणनीति रूप से संवेदनशील होर्मुज जलडमरूमध्य के नीचे बिछी प्रमुख सबसी ऑप्टिकल फाइबर इंटरनेट केबल्स को काटने की विस्तृत योजना बनाई है।
इतना ही नहीं, ईरानी सुरक्षा अधिकारियों और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के बयानों के मुताबिक, केबल्स को काटने के बाद उनकी मरम्मत की कोशिशों को भी पूरी तरह से रोका जाएगा ताकि डिजिटल नेटवर्क लंबे समय तक बाधित रहे।
अंडरसी केबल्स क्या हैं और ईरान की यह चाल क्यों है रणनीतिक?
समुद्र के नीचे बिछीं ये ऑप्टिकल फाइबर केबल्स वैश्विक डिजिटल संचार की रीढ़ हैं। ये कांच के बेहद महीन धागों के जरिए रोशनी की गति से डेटा ट्रांसमिट करती हैं।
ईरान का मुख्य मकसद: यूएई, सऊदी अरब और कतर जैसे खाड़ी देशों में अमेरिका की प्रमुख टेक कंपनियों—गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन —ने डेटा सेंटर्स, एआई सुविधाओं और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में अरबों डॉलर का निवेश किया है। ईरान का मानना है कि इन केबल्स और डेटा सेंटर्स पर खतरे के चलते खाड़ी देश और अमेरिकी टेक दिग्गज राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन पर हमला न करने का कूटनीतिक दबाव बनाएंगे।
लक्ष्य पर बिछीं केबल्स: फारस की खाड़ी और होर्मुज में बिछी 7 प्रमुख केबल्स, जिनमें FALCON, AAE-1 और Gulf Bridge International (GBI) शामिल हैं, ईरान की जवाबी योजना का सीधा निशाना हैं।
अगर केबल्स कटीं, तो दुनिया और खाड़ी क्षेत्र पर क्या असर होगा?
मौसम और टेलीकॉम रिसर्च संस्था टेलीजियोग्राफी के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य के नीचे से वैश्विक डेटा ट्रैफिक का 1% से भी कम हिस्सा गुजरता है। इसलिए पूरी दुनिया का इंटरनेट अचानक बंद नहीं होगा, लेकिन इसके क्षेत्रीय और आर्थिक प्रभाव बहुत व्यापक होंगे:
- खाड़ी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर प्रहार: संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर और ओमान में इंटरनेट की रफ्तार बहुत धीमी पड़ सकती है। बैंकिंग, शेयर बाजार, क्लाउड कंप्यूटिंग, ऑनलाइन पेमेंट और ई-कॉमर्स जैसी सुविधाएं कई दिनों या हफ्तों के लिए ठप हो सकती हैं।
- मरम्मत में भारी रुकावट: समुद्र के नीचे केबल्स को ठीक करने के लिए विशेष पोतों और शांत समुद्री माहौल की जरूरत होती है। यदि युद्ध की स्थिति में मरम्मत करने वाले जहाजों पर हमले का खतरा रहेगा या उन्हें परमिट नहीं मिलेंगे, तो मरम्मत का काम हफ्तों की जगह महीनों अटक सकता है।
- सैटेलाइट इंटरनेट सीमित विकल्प: स्टारलिंक जैसी उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवाएं (Satellite Networks) इस तरह के बड़े डेटा ट्रैफिक का विकल्प नहीं बन सकतीं, क्योंकि उनकी क्षमता बेहद सीमित और लागत बहुत अधिक होती है।
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भारत पर कितना पड़ेगा असर?
भारत वैश्विक स्तर पर 17 से 18 अंतरराष्ट्रीय अंडरसी केबल्स से जुड़ा हुआ है, जिनके प्राथमिक 'लैंडिंग स्टेशन' मुंबई और चेन्नई में हैं:
- सीधा संकट नहीं: भारत की अपनी इंटरनेट कनेक्टिविटी का अधिकांश हिस्सा लाल सागर (Red Sea) और अन्य समुद्री corridors से होकर गुजरता है। इसलिए भारत के भीतर घरेलू इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह ठप नहीं होंगी।
- खाड़ी देशों से संपर्क पर असर: 'FALCON' जैसी प्रमुख केबल क्षतिग्रस्त होने से भारत और खाड़ी देशों (UAE, सऊदी अरब आदि) के बीच फोन कॉल, डेटा एक्सचेंज, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और वित्तीय लेन-देन पर आंशिक व अस्थायी प्रभाव जरूर पड़ सकता है।
- रेड सी मार्ग असली चिंता: रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक के लिए होर्मुज से ज्यादा संवेदनशील मार्ग 'लाल सागर Corridor' है, जिससे भारत का लगभग 25% ट्रैफिक गुजरता है।
ईरान की यह धमकी दिखाती है कि 21वीं सदी के युद्ध केवल मिसाइलों या ड्रोन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि 'डिजिटल और सबसी वारफेयर' भी युद्ध का एक बड़ा हथियार बन चुके हैं। अगर अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य झड़प दोबारा शुरू होती है, तो इसका खमियाजा पूरे मध्य पूर्व के डिजिटल साम्राज्य को भुगतना पड़ सकता है।
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