रक्तदान मानवता की सबसे बड़ी सेवा है।रक्तदान से हम किसी की जान बचा सकते हैं,मानव रक्त का कोई विकल्प नहीं है। जरूरत पड़ने पर हमेशा मनुष्य को मनुष्य के ही रक्त की जरूरत होती है। 50 वर्ष से कम आयु के लोग जो स्वस्थ हों और उन्हें कोई गंभीर बीमारी न हो वे रक्तदान कर सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ ब्लड थिनर लेने वाले पीलिया खासकर हेपेटाइटिस बी या सी अथवा एनीमिया से ग्रसित रह चुके लोगों को रक्तदान से परहेज करना चाहिए। एक यूनिट (लगभग 300-350 मिली लीटर) रक्तदान करने से शरीर पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं होता और न ही कमजोरी होती है। चिकित्सकों के मुताबिक एक स्वस्थ मनुष्य के शरीर में इतनी क्षमता होती है कि एक यूनिट रक्तदान करने के बाद दो-तीन दिनों में बोन मैरो उसकी क्षतिपूर्ति करना शुरू कर देता है। रक्तदान में उपयोगी चिकित्सीय उपकरण डिस्पोजेबल होने के कारण रक्तदान के समय संक्रमण की संभावना बिल्कुल नहीं होती है। रक्तदान से पहले हेपेटाइटिस, एचआईवी और मलेरिया जैसी अन्य आवश्यक जांच करना अनिवार्य होता है। रक्त के सैंपल में यदि कोई बीमारी पॉजिटिव आती है तो इसकी गोपनीयता रखते हुए ब्लड बैंक द्वारा जानकारी दी जाती है।





रक्तदाताओं को रक्तदान से पहले यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि उनका पेट भरा हो। खाली पेट रक्तदान न करें। वहीं रक्तदान के बाद पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक आहार लें। यदि रक्तदान के बाद कमजोरी महसूस हो तो लगभग आधे घंटे अवश्य आराम कर लें। रक्तदान जीवन दान के समान है।लेखक वॉलंटरी ब्लड डोनर्स एसोसिएशन,रांची के सचिव हैं।