पूर्वांचल सूर्य ब्यूरो,चतरा। जिले में इन दिनों आम अवाम का हाल बेहाल है।चिलचिलाती गर्मी और लू के गर्म थपेड़ों के बीच लोगों का घर से निकलना दूभर हो गया है। सुबह 8बजे के बाद दिन का तापमान गर्मी की सारी हदें पार कर जाता है। आम जन जीवन से लेकर पशु पक्षियों तक का हाल गर्मी से बेहाल है।
जिले के अधिकांश जल के स्रोत सूख चुके हैं।चतरा जिला का हेरूवा नदी का जल स्रोत अप्रैल माह में ही दम तोड़ चुका था। चतरा जिले की निलांजना नदी भी सूख चुकी है। हंटरगंज, लावालौंग, टंडवा, सिमरिया, पत्थलगड़ा, गिद्धौर और इटखोरी प्रखंड में प्राय: सभी जल स्रोत दम तोड़ चुके हैं। महाने नदी पूरी तरह सूख चुकी है। बक्सा डैम भी अंतिम सांसे ले रहा है। गांवों में लोग दूर दराज से पानी की व्यवस्था कर अपनी प्यास बुझा रहे हैं। जल आपूर्ति के वैकल्पिक साधनों के माध्यम से लोग अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। नदी, नहरें, कुएं, तालाब आदि जल के स्रोत सब सूख गए हैं। जल के स्रोतों के सूख जाने का प्रभाव आम लोगों से लेकर पशु पक्षियों तक को प्रभावित कर रहा है।
खेतों में लगी हुई फसलें सिंचाई के अभाव में अब दम तोड़ रही है।विशेष कर सब्जी के फसलों पर यह गर्मी कहर बनकर टूट पड़ी है,जिसके कारण बाजारों में सब्जियों के मूल्य में वृद्धि का रुख देखा जा रहा है। किसानों के चेहरे पर मायूसी नजर आ रही है। कयास लगाए जा रहे थे कि 15 जून तक झारखंड में मानसून दस्तक तक देगा,लेकिन झारखंड के तापमान को देखते हुए मौसम वैज्ञानिकों का यह अनुमान भी असफल सिद्ध हो रहा है।
एक ओर जहां किसान जल के अभाव में सिंचाई के बिना फसलों को बर्बाद होते हुए मायूस नजरों से देख रहे हैं।वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक जल संसाधनों के स्रोतों के सूख जाने के कारण पशु पक्षियों को भी अपनी प्यास बुझाने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। मानसून के लेट लतीफी के कारण जहां किसानों के चेहरे पर मायूसी नजर आ रही है।वहीं सब्जियों के लिए आम उपभोक्ताओं को अपनी जेबें ढीली करनी पड़ रही हैं।
सब्जियों के भाव आसमान छू रहे हैं। सिंचाई के अभाव में फसलें सूख रही हैं। कहीं-कहीं भूजल स्तर नीचे हो जाने के कारण जमीनों में दरारें फटने लगी है। चतरा जिले में मई माह में बढ़ते तापमान के कारण बहुतायत मात्रा में चमगादड़ों की मौत हुई थी। चिलचिलाती गर्मी के कारण लोगों का घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया है। जिले के कई भागों से गर्मी से राहत पाने के वैकल्पिक संसाधनों के असफल हो जाने की भी सूचनाएं आ रही है। गर्मी से आक्रांत लोग त्राहिमाम कर रहे हैं और आसमान की ओर टकटकी लगाए हुए हैं कि कब आसमान से आशा की कुछ बूंदें टपकेगी। लू के थपेड़े और सूरज से बरसते अंगारे देख कर ऐसा नहीं लगता कि इस सप्ताह भी मानसून झारखंड की धरती पर दस्तक देगा।





