नई दिल्ली |लोकसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव एक नए स्तर पर पहुंच गया है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर सदन को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ एक 'स्वतंत्र प्रस्ताव' (Substantive Motion) पेश करने का नोटिस दिया है। दुबे का तर्क है कि एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि होने के नाते देश की एकता और अखंडता की रक्षा करना उनका संवैधानिक कर्तव्य है।
क्या होता है 'स्वतंत्र प्रस्ताव'
संसदीय प्रक्रियाओं के विशेषज्ञ एम.एन. कौल और एस.एल. शकधर की प्रसिद्ध पुस्तक 'प्रैक्टिस एंड प्रोसीजर ऑफ पार्लियामेंट' के अनुसार, एक स्वतंत्र प्रस्ताव एक 'आत्म-निहित स्वतंत्र प्रस्ताव' होता है।
इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
यह किसी अन्य विषय पर निर्भर नहीं होता, बल्कि स्वयं में पूर्ण होता है।
इसे इस तरह से तैयार किया जाता है कि सदन इस पर अपनी स्पष्ट राय या निर्णय व्यक्त कर सके।
यह गंभीर मामलों में सदन की मंजूरी प्राप्त करने के लिए पेश किया जाता है।
स्वतंत्र प्रस्ताव के प्रमुख उदाहरण
लोकसभा में कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं इसी प्रस्ताव के अंतर्गत आती हैं:
अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव।
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव।
मंत्रिपरिषद में विश्वास या अविश्वास प्रस्ताव।
लोक महत्व के विषयों पर स्थगन प्रस्ताव।
अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का संकल्प।
निशिकांत दुबे का पक्ष: "संवैधानिक कर्तव्य का निर्वहन"
अपने नोटिस में निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी पर चार गंभीर दुराचारों (Misdemeanours) का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा, "यदि मैं एक जिम्मेदार जनसेवक होने के नाते इन विषयों को सदन के संज्ञान में नहीं लाता हूँ, तो मैं देश की संप्रभुता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने के अपने संवैधानिक कर्तव्य के साथ न्याय नहीं करूँगा।"
अब आगे क्या?
एक बार जब कोई सदस्य इस तरह के प्रस्ताव का नोटिस देता है, तो गेंद लोकसभा अध्यक्ष के पाले में होती है। यदि अध्यक्ष इसे स्वीकार करते हैं, तो सदन में इस पर चर्चा और मतदान की स्थिति बन सकती है। विपक्ष के नेता के खिलाफ इस तरह का कदम संसदीय इतिहास में विरली ही देखने को मिलता है, जो आने वाले दिनों में सदन के माहौल को और अधिक गरमा सकता है।





