पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के प्रोटोकॉल को लेकर केंद्र सरकार और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस गीत के सभी छह अंतरा (Stanzas) गाने और इसे राष्ट्रगान से पहले अनिवार्य करने के केंद्र के निर्देश को TMC ने रवींद्रनाथ टैगोर का अपमान बताया है।
कोलकाता/नई दिल्ली |केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा 28 जनवरी, 2026 को जारी एक निर्देश ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में उबाल ला दिया है। केंद्र ने राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के 150वें वर्ष के उपलक्ष्य में पहली बार इसके गायन के लिए विस्तृत प्रोटोकॉल अधिसूचित किए हैं।
क्या है केंद्र का नया निर्देश?
गृह मंत्रालय के आदेश के अनुसार:
छह अंतरा का गायन: अब आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल पहले दो नहीं, बल्कि सभी 6 अंतरा गाए जाएंगे (कुल समय: 3 मिनट 10 सेकंड)।
वरीयता क्रम: यदि राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान एक साथ बजाए जाते हैं, तो वंदे मातरम पहले गाया या बजाया जाएगा, उसके बाद जन गण मन होगा।
सम्मान: राष्ट्रगीत बजते समय दर्शकों को सावधान (Attention) की मुद्रा में खड़ा होना अनिवार्य होगा।
TMC का पलटवार: 'रवींद्रनाथ टैगोर का अपमान'
राज्य के शिक्षा मंत्री ब्रात्य बसु ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह सीधे तौर पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का अपमान है।
पदानुक्रम का आरोप: TMC का कहना है कि राष्ट्रगान से पहले राष्ट्रगीत को अनिवार्य करना एक प्रकार का "पदानुक्रम (Hierarchy)" बनाना है, जो टैगोर की महानता को कम करने की कोशिश है।
इतिहास का हवाला: 1937 में कांग्रेस ने टैगोर की सलाह पर ही केवल पहले दो अंतरा को अपनाया था ताकि देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बने को बनाए रखा जा सके।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
ब्रात्य बसु (TMC): "RSS और हिंदुत्ववादी ताकतें कभी भी टैगोर के खुले विचारों को पसंद नहीं करती थीं। अब वे बंकिम चंद्र और टैगोर के बीच विभाजन पैदा कर रहे हैं।"
सुजन चक्रवर्ती (CPI-M): "भाजपा बंगाल के प्रतीकों के बीच भेदभाव कर रही है। पहले पोर्ट का नाम बदला, अब वे तय कर रहे हैं कि कौन सा कवि बड़ा है।"
शमीक भट्टाचार्य (BJP): "यह कदम चुनावी नहीं है। वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर इसे पूर्ण सम्मान देना हमारा कर्तव्य है। टैगोर के अपमान की बात बचकानी है।"
विवाद की जड़: 2 बनाम 6 अंतरा
ऐतिहासिक रूप से, संविधान सभा ने 1950 में वंदे मातरम के केवल पहले दो अंतरा को ही राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया था। शेष चार अंतरा में देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के संदर्भों के कारण तत्कालीन मुस्लिम लीग और कुछ अन्य समुदायों ने आपत्ति जताई थी। अब केंद्र सरकार ने 150 साल बाद इसे इसके मूल स्वरूप में पुनर्स्थापित करने का निर्णय लिया है।
निष्कर्ष: बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से ठीक पहले इस भावनात्मक मुद्दे ने 'बंगाली अस्मिता' की बहस को फिर से तेज कर दिया है। जहाँ भाजपा इसे राष्ट्रवाद और बंकिम बाबू के सम्मान से जोड़ रही है, वहीं TMC इसे 'बाहरी बनाम बंगाली' और 'टैगोर विरोधी' बताकर मतदाताओं को लामबंद करने की कोशिश में है।





