आइची-नागोया: जापान के आइची-नागोया में चल रहे एशियाई पैरा खेलों (Asian Para Games 2026) में भारत के पैरा एथलीटों का दबदबा लगातार जारी है। महाराष्ट्र के नासिक से ताल्लुक रखने वाले युवा धावक दिलीप गावित ने ट्रैक पर ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए देश का मान बढ़ाया है। बुधवार को पुरुषों की 100 मीटर T47 स्पर्धा में दिलीप ने शानदार दौड़ लगाते हुए गोल्ड मेडल पर कब्जा कर लिया।
इस मुकाबले की सबसे खास बात यह रही कि पोडियम पर भारत का ही दबदबा रहा। दिलीप ने भारत के ही दूसरे धावक मोहम्मद मोरसिंगनाकाथ को पछाड़कर स्वर्ण पदक जीता, जबकि मोहम्मद मोरसिंगनाकाथ को रजत (सिल्वर) पदक से संतोष करना पड़ा। वहीं, चीन के एथलीट ने इस स्पर्धा का कांस्य (ब्रॉन्ज) पदक अपने नाम किया। दिलीप गावित ने महज 10.69 सेकंड का बेहतरीन समय निकालकर यह रेस अपने नाम की, जबकि मोहम्मद मोरसिंगनाकाथ 10.72 सेकंड का समय निकालकर दूसरे स्थान पर रहे।
संघर्षों से भरी दिलीप गावित की प्रेरणादायक कहानी
आज देश का सिर गर्व से ऊंचा करने वाले दिलीप गावित का यहां तक पहुंचना किसी संघर्ष गाथा से कम नहीं है। एक भयानक दुर्घटना ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल कर रख दिया था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
- बचपन की दुर्घटना और गंभीर परिणाम: महाराष्ट्र के नासिक के पास तोरण डोंगरी गांव के एक गरीब आदिवासी परिवार में 21 अप्रैल 2003 को जन्मे दिलीप जब महज 5 वर्ष के थे, तब वे एक पेड़ से नीचे गिर गए थे। इस दुर्घटना में उनके दाहिने हाथ में गंभीर चोट आई। दुर्भाग्यवश, ग्रामीण इलाके में समय पर सही और बेहतर चिकित्सा सुविधा न मिलने के कारण उनके घाव में गैंग्रीन (संक्रमण) फैल गया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि उनकी जान बचाने के लिए डॉक्टरों को कोहनी के नीचे से उनका दाहिना हाथ काटना पड़ा।
- आर्थिक तंगी और मजदूरी का दौर: एक तो कम उम्र में हाथ गंवाने का दर्द और ऊपर से अत्यंत गरीब परिवार। उनका परिवार पूरी तरह से खेती पर निर्भर था। कई बार कम बारिश के चलते फसल बर्बाद हो जाती थी, जिससे परिवार का गुजारा चलाने के लिए परिजनों को मजदूरी तक करनी पड़ती थी। चूंकि दिलीप का दाहिना हाथ नहीं था, इसलिए वे मजदूरी में हाथ भी नहीं बंटा पाते थे, जो उनके लिए और भी मानसिक पीड़ा का विषय था। ऐसे में लोग उन्हें अक्सर ताने देते थे और किसी काम का नहीं समझते थे।
- कोच वैजनाथ काले बने मसीहा: दिलीप के जीवन में असली बदलाव तब आया जब उनके स्कूल के कोच वैजनाथ काले ने उनकी जिंदगी में कदम रखा। कोच ने दिलीप के भीतर छिपे हुए एथलीट को पहचाना और उन्हें नासिक ले जाकर पेशेवर ट्रेनिंग देनी शुरू की। शुरुआत में कोच ने ही उनके रहने और खाने का पूरा खर्च उठाया। शारीरिक चुनौतियों के बावजूद दिलीप ने सक्षम (सामान्य) खिलाड़ियों के साथ कड़ा अभ्यास किया।
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सफलता की बुलंदियों को छूता सफर
कड़ी मेहनत और पक्के इरादों के दम पर दिलीप ने पीछे मुड़कर नहीं देखा:
- 2019: खेलो इंडिया यूथ गेम्स में उन्होंने 4×400 मीटर रिले टीम के साथ कांस्य पदक जीतकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
- 2023: 2023 के एशियन पैरा गेम्स में उन्होंने 400 मीटर रेस में शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया था।
- 2026 (वर्तमान): अब आइची-नागोया एशियाई पैरा खेलों में 100 मीटर T47 स्पर्धा में गोल्ड जीतकर उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया कि हौसले बुलंद हों, तो शारीरिक कमियां कभी भी सफलता के आड़े नहीं आतीं।
दिलीप गावित की यह सफलता देश के उन तमाम युवाओं के लिए एक मिसाल है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सपनों को पूरा करने की जिद रखते हैं।
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