विशेष संवाददाता | नई दिल्ली
नई दिल्ली: देश भर के अस्पतालों में शरीर का तापमान मापने के लिए सालों से इस्तेमाल हो रहे पारंपरिक पारे (Mercury) वाले थर्मामीटर और ब्लड प्रेशर (BP) नापने वाले उपकरणों को अब चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह हटा दिया जाएगा। केंद्र सरकार ने वर्ष 2030 तक भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं को 'पारा मुक्त' (Mercury-Free) बनाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है।
इस वृहद अभियान को सफल बनाने के लिए केंद्र सरकार, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और सभी राज्य सरकारें मिलकर एक एकीकृत रणनीति के तहत काम कर रही हैं।
सुरक्षा और सुरक्षित निपटान मुख्य उद्देश्य
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, पारे के संपर्क में आने से तंत्रिका तंत्र, किडनी और फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुँच सकता है। थर्मामीटर या बीपी मशीन के टूटने पर पारे का रिसाव मरीजों, डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के लिए बड़ा स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य अस्पतालों में मरीजों और स्वास्थ्यकर्मियों को पारे के दुष्प्रभावों से सुरक्षित रखना और बायो-मेडिकल कचरे के तहत इन पुराने जहरीले उपकरणों के सुरक्षित निपटान (Safe Disposal) की एक मजबूत व्यवस्था बनाना है।
14 राज्यों के सर्वे में 39,528 पारे वाले उपकरण चिन्हित
डब्ल्यूएचओ (WHO) द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 14 राज्यों में किए गए व्यापक आकलन के दौरान लगभग 27,827 स्वास्थ्य केंद्रों की गहन जांच की गई।
आकलन के मुख्य आंकड़े:
- कुल जांच किए गए स्वास्थ्य केंद्र: 27,827
- बदले जाने वाले पारे के उपकरण: 39,528 (थर्मामीटर और बीपी मशीनें)
- मूल्यांकन पूरा करने वाले राज्य: 14 राज्य
- चरणबद्ध प्रतिबंध के निर्देश जारी करने वाले राज्य: 12 राज्य
कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से पारा पूरी तरह बेदखल
पारे के उपकरणों को हटाने की दिशा में देश के कई हिस्सों में बेहतरीन प्रगति हुई है।
- दिल्ली ने 2007 में ही की थी शुरुआत: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली ने वर्ष 2007 में ही अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों से पारे वाले उपकरणों को हटाने की दूरदर्शी घोषणा कर दी थी।
- पूर्ण रूप से पारा मुक्त क्षेत्र: दिल्ली, पंजाब, मणिपुर, सिक्किम, गोवा, हरियाणा, लद्दाख, चंडीगढ़ और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं से पारे वाले चिकित्सा उपकरणों का इस्तेमाल पूरी तरह से खत्म किया जा चुका है।
बाकी बचे राज्यों में भी डिजिटल और एनालॉग (बिना पारे वाले) आधुनिक विकल्पों को तेजी से अपनाया जा रहा है, जिससे 2030 तक देश का संपूर्ण हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह से पारे के खतरे से मुक्त हो जाएगा।





