लखनऊ। उत्तर प्रदेश के जंगलों में इको पर्यटन मंगलवार 15 नवंबर से शुरू हो गया है।पर्यटक प्रकृति की गोद में दुर्लभ वन्यजीवों का जीभर के दीदार करेंगे।दुधवा टाइगर रिजर्व, पीलीभीत टाइगर रिजर्व, कतर्नियाघाट, चूका, सोहगीबरवा वन्य जीव क्षेत्र, कैमूर वन्य जीव विहार, चंद्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य और चम्बल वन्य जीव विहार सहित अन्य इको पर्यटन स्थलों के द्वार पर्यटकों के लिए खोल दिए गए हैं। पर्यटकों के लिए 15 नवंबर से 15 जून तक का समय वन्य और जलीय जीवों की सुखद और सहज उपस्थिति देखने वाला होगा।





कतर्नियाघाट में दुर्लभ ही है सुलभ





कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य भारत-नेपाल सीमा पर यूपी के बहराइच जिले की नानपारा तहसील में स्थित है।इसकी अगर बात करें तो शहरी कोलाहल से दूर कतर्नियाघाट एक ऐसी जगह है, जिसके जर्रे-जर्रे में प्रकृति ने अपनी खूबसूरती लुटा रखी है।घने जंगल और नदी-तालाबों के बीच उड़ान भरते पंछी, मदमस्त होकर नाचता मोर,बाघों की दहाड़,वृक्षों की शाखाओं पर आराम फर्माते तेंदुए, कुलाचें भरते चीतल, पाढ़ा, बार्रांसघा, सांभर, काकड़ तथा लम्बे थूथन से वन भूमि खोदते जंगली सुअर, वृक्षों की डालों पर झूलते विविध प्रजाति के बन्दर व लंगूर,विचरण करते दुर्लभ प्रजाति के वन्य जीव, इस पूरे वन्य क्षेत्र को दुनिया के सबसे सुन्दर ईको टूरिज्म वाले इलाकों में शुमार करते हैं‌।प्रकृति कतर्नियाघाट सेंचुरी पर इस कदर मेहरबान हुई है कि यहां के बारे में कहा जाता है कि इस स्थान पर दुर्लभ ही सुलभ है।जंगल के बीच में बहने वाली गिरवा नदी यहां के माहौल को और भी खूबसूरत बना देती है।गिरवा रिवर बोट सफारी का आनंद यहां आया हर पर्यटक लेना चाहता है।





गिरवा नदी कतर्नियाघाट की बढ़ती है





नेपाल से निकलकर कतर्नियाघाट तक कल-कल निनाद कर बहने वाली गिरवा (गेरुवा) नदी देश की उन नदियों में से है जिनमें,ताजे पानी में पाई जाने वाली डॉल्फिन रहती हैं।डॉल्फिन का यह प्राकृतिक निवास है और नदी में इनके आभास मात्र से ही एक अलग रोमांच की अनुभूति होती है।इसलिए रिवर बोट सफारी घूमे बिना बिना पर्यटकों की यात्रा पूरी नहीं मानी जाती है।पर्यटन सत्र की शुरुआत होने के साथ ही विभाग ने भी तैयारियां पूरी कर ली हैं।इस बार पर्यटक उद्घाटन के दिनों से ही पर्यटक बोट सफारी का आनंद ले सकेंगे।कुलांचे मारते हुए हिरनों के झुंड, गेरुआ नदी में उछल कूद करती डाल्फिनें, धूप सेंकते घड़ियाल और जंगल का मनोरम दृश्य आपका मन मोह लेगा।





कतर्नियाघाट अन्य अभ्यारण्यों से ज्यादा है समृद्ध





आपको बता दें कि 551 वर्ग किलोमीटर में फैला कतर्नियाघाट वन्यजीव विहार कई मायनों में देश के अन्य राष्ट्रीय अभ्यारण्यों से ज्यादा समृद्ध है।यहां के संरक्षित माहौल के कारण तेजी से घट रहे बाघों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।यहां मौजूद बेंत के जंगल बाघों के सबसे सुरक्षित प्राकृतिक आवास माने जाते हैं।हिरणों की बड़ी संख्या से लेकर पानी की मौजूदगी बाघों की संख्या बढ़ने का खास कारण है।इसके अलावा तेंदुआ, हाथी, बारहसिंघा, स्पौटेड डियर, स्नैक बर्ड और अन्य दुर्लभ वन्यजीव सेंचुरी को बेहद भव्य बनाते हैं।यहां की खुशगवार आबो-हवा में मदमस्त होकर नाचते हुए मोर पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। कतर्नियाघाट को यहां बहुतायात में दिखने वाले घड़ियालों के कारण भी जाना जाता है।विलुप्त होते जीवों के दर्जे में शामिल ये घड़ियाल विश्व में मात्र भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाते हैं।नदी के ऊपर उड़ते हुए पंछियों के झुंड का नजारा मन को प्रसन्न कर देता है।लारसर, बड़ा पनकौआ, सुरखाब, यहां की रौनक को और बढ़ाते नजर आते हैं।पर्यटक इन पक्षियों को अच्छी तरह से दीदार कर सकें, इसके लिए विभिन्न स्थानों पर बर्ड टॉवर भी बनाए गए हैं।





ट्री हट में ठहरकर रोमांच का करें अनुभव





कतर्निया रेंज में गेरुआ नदी के तट पर थारू हट और सेमल के पेड़ों पर ट्री हट जैसी शानदार व्यवस्था की गई है।यहां बैठकर पर्यटक प्राकृतिक विविधता के रोमांच का आनंद उठा सकते हैं।गेरुआ नदी के किनारे ऊंट से दोगुने ऊंचे इन ट्री हट पर एक रात वीराने में बिताना पर्यटकों की जिंदगी के सबसे खूबसूरत लम्हों में से हो सकता है।विशेषज्ञों ने कई कोणों से गेरुआ नदी के किनारे विभिन्न पेड़ों को देखने-परखने के बाद बोटिंग प्वाइंट के पास सेमल के इन ऊंचे दरख्तों पर यह अत्याधुनिक हट बनवायी है।ये सुविधा के मामले में बड़े होटलों को भी मात देती है।इसके अलावा ककरहा रेंज में स्विस कॉटेज भी पर्यटकों का इस्तकबाल करता नजर आता है।मोतीपुर और ककरहा रेंज में इको टूरिज्म के रूप में विकसित विश्राम भवन के अलावा वातानुकूलित थारू हट, डबल स्टोरी डॉरमेट्री की व्यवस्था है। इनमें आधुनिक शौचालय का भी निर्माण किया गया है। इको टूरिज्म के लिए नए सिरे से निर्मित भवनों के अलावा ककरहा, मोतीपुर, निशानगाड़ा, धर्मापुर, मुर्तिहा और कतर्नियाघाट गेस्ट हाउस में भी पर्यटकों के ठहरने की व्यवस्था है।





कतर्निया में मौजूद दुलर्भ जानवरों का बायोडाटा





बाघ 26, चीतल6000, तेंदुए 70, सांभर35, नीलगाय1800, काकड़200, गैंडा 4, लंगूर6000, डाल्फिन70, घड़ियाल400, पालतू हाथी दो, गैंडा 5, बारहसिंहा75, जंगली हाथी40, जंगली सुअर 7000 और जंगल के बीच पेड़ों के 60 फीट बने ट्री हट।





इको टूरिज्म के प्रमुख पर्यटन स्थलों के लिए ऑनलाइन बुक‍िंिं



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अतिथि गृहों के आरक्षण के लिए बहराइच स्थित वन विभाग के डिवीजन कार्यालय पर प्रार्थना पत्र देने के साथ ऑनलाइन बुकिंग कराने के लिए वेबसाइट www.upecotourism.in पर भी संपर्क कर सकते हैं।इस वेबसाइट पर इको टूरिज्म के सभी प्रमुख पर्यटन स्थलों के लिए ऑनलाइन बुकिंग भी कराई जा सकती है।





कतर्निया आने का ये है रास्ता





कतर्निया आने के लिए लखनऊ या दूसरे शहरों से बसों के जरिए बहराइच पहुंचा जा सकता है। बहराइच से वन क्षेत्र के लिए टैक्सियां संचालित हैं। साथ ही निजी वाहनों से भी जंगल तक सीधे पहुंचा जा सकता है।





कतर्नियाघाट वन्य जीव प्रभाग बहराइच के डीएफओ आकाशदीप बधावन ने बताया कि पर्यटकों को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो, इसके लिए कर्मचारियों को तैनात किया गया है। उन्होंने बताया कि जंगल क्षेत्र में पर्यटकों के भोजन आदि की व्यवस्था भी कैंटीन लगाकर की गई है। सफारी के दौरान गाइड और वन सुरक्षाकर्मी भी मुस्तैद हैं, जिससे कि पर्यटकों को जंगल से रूबरू कराया जा सके।