लखनऊ।भारत में 2001 की जनगणना के अनुसार 5 से 14 वर्ष की उम्र के 1 करोड़ 26 लाख 66 हजार 377 बच्चे बालमजदूरी करते थे, वहीं 2011 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार ये आंकड़ा घट कर 43 लाख 53 हजार 247 रह गया है,हालांकि भारत के टॉप राज्यों में उत्तर प्रदेश और गुजरात में बाल मजदूरी की दर अन्य राज्यों से ज्यादा है।कासगंज की असिस्टेंट लेबर कमिश्नर बताती है हमने 2021 में कुल 6 कार्यवाही की है और 2022 में अभी तक कोई कार्यवाही नही की है।





अब हम आपको जीवन के उस चक्र से अवगत करवाने जा रहे हैं।जब हम घर से अपने परिवार के साथ गाड़ी में बैठ कर निकलते है,जब हम कभी गर्मियों की छुट्टियों को व्यतीत करने या किसी शादी समारोह में या परिवार साथ घूमने जाते हैं तो रास्ते में गाड़ी की हवा पानी चेेक करवाने के लिए किसी हवा वाले की दुकान पर रुकते हैं,तभी वहां पर हमें एक छोटा सा लड़का दिखाई देता है,उसके बाद में हम आवाज लगाते हैं ओए, 'छोटू' जरा गाड़ी की हवा चैक करना, 'छोटू' नाम का प्रयोग हम इसलिए करते है क्योंकि हमे नाम मालूम ही नहीं होता है और ऐसे बाल मजदूरों को समाज के लोग हम और आप छोटू नाम से ज्यादातर संबोधित करते है।हमारे जीवन के वो जो खुशी में बिताने जा रहे होते है उसकी शुरुआत भी बाल मजदूर 'छोटू' के नाम से होती है।





जैसे ही हमारे सफर की कहानी छोटू से हवा चैक करवा कर आगे बढ़ते है तो गाड़ी में बैठे हुए बच्चे कहते है- 'पापा कोल्ड-ड्रिंक पीनी है।जिसके बाद में हम फिर सफर में आगे बढ़ते जाते है और रास्ते में दुकान या ढाबा दिखता है तो वहां पर रुक जाते हैं,तभी वहां पर एक 12-13 वर्ष का लड़का आता है,हम फिर उसके लड़के का नाम 'छोटू' रख देते है वही छोटू आता है और कहता है साहब जी क्या चाहिए,जिसके बाद में परिवार साथ सलाह मशविरा कर आदेश दिया जाता है 'दो चाय, दो कोल्ड-ड्रिंक और चार समोसे ले आइये, अगर सामान तुरंत तैयार होता है तो वो छोटू तुंरत ले आता है,अगर समय लगता है तो हम कहते है 'क्या हुआ छोटू इतना समय नही है'.जिसके बाद में छोटू जल्द ही चाय कोलड्रिंक इत्यादि लाकर देता है उसके बाद में हम उसे 'कुछ पैसे देकर के आगे की तरफ बढ़ जाते है।





हम एक-एक कर गांवों से निकलते हुए देखते हुए जाते है,कि कुछ बच्चे स्कूल की तरफ जा रहे है तो कुछ खेतो की तरफ और बच्चे बकरी,भेड़, मवेशियों को चराने के लिए जंगल की ओर ले जा रहे है। गांवों से होते हुए हम शहर में आ जाते है,शहर में प्रवेश करते ही चौराहे पर रेड सिग्नल आ जाता है,सिग्नल पर गाड़ी में ब्रेक सही से लग भी न पाई थी,तभी एक और 'छोटू' की एंट्री होती है,11-12 वर्ष की लड़की और इससे थोड़ा सा बड़ा लड़का हाथों में कुछ सामान लिए गाड़ी के नजदीक आकर कहता है,अंकल जी ये वाईपर ले लो ये कहते गाड़ी से धूल साफ करते हुए कहता रहता बहुत अच्छा है,ये बहुत दिनों तक चलेगा और अपनी चीजो की खासियत बताते हुए अपना वाइपर हमे खरीदने के लिए प्रेरित करता है,वही दूसरी तरफ से एक छोटी सी लड़की कहती है,ये कार के अंदर लगाने के लिए एक झालर ले लो, जिसके बाद में अंदर बैठे बच्चे कहते हैं पापा ले लो कितना अच्छा है,तब लगता है बच्चे ही बच्चो का दर्द समझ पाते है। उसके बाद में कुछ लोग उनसे बगैर सामान खरीदे ही निकल जाते है,कुछ लोग पैसे भी दे देते है सामान भी नही लेते है।जैसे ही इन बच्चों से सामान खरीदा उनके चेहरे पर एक 'मुस्कराती' मुस्कान तैर जाती है। अब सिग्नल ग्रीन होते ही गाड़ी आगे बढ़ा दी,लेकिन उन बच्चों की मुस्कान कई सवाल छोड़ गई कि 'मेरे बच्चे मेरे साथ गाड़ी में घूम रहे हैं।अपने बचपन का आंनद ले रहे हैं,लेकिन रास्ते में विभिन्न जगहों पर मिलने वाले बच्चे का बचपन कहां है ऐसी कौन सी मजबूरियांं हैं जो इन बच्चों को इस तरह मजदूरी करनी पड़ रही है। ये कोई नई कहानी नही थी ऐसी कहानियों से हमे रोज दो-चार होना पड़ता है,चाहे दफ्तर जा रहे हो,मंदिर जा रहे हो,शादी में जा रहे हो या परिवार के साथ बाहर रेस्टोरेंट में खाना खाने जा रहे हों ये कहानी हम रोज देखते है।





अब जाहिर है शौक से तो ये इन काम-धंधों में लगे नहीं होंगे कोई न कोई मजबूरी जरूर रही होगी जो इनको मजदूरी के रास्ते पर चलना पड़ रहा है। हर बच्चे को बचपन में 'आप बड़े होकर क्या बनोगे'? नामक प्रश्न से गुजरना पड़ता है,लेकिन बाल श्रम में लगे बच्चों से भी क्या किसी ने पूछा होगा कि आप बड़े होकर क्या बनना चाहते हो? शायद किसी ने नहीं, इनके संपर्क में आने वाले ज्यादातर लोगों ने यही सोचा होगा कि ये तो पैदा होते ही श्रमिक का ठप्पा लगवाकर आए हैं।





बाल श्रम करने वाले बच्चों में से हो सकता है किसी ने आपके पूछने पर कहा हो कि वह शिक्षक बनना चाहता है या वह चिकित्सक बनना चाहता है या फिर और भी बहुत कुछ, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हमनें कभी यह जानने की कोशिश की कि कितने बच्चे हैं जो अपने इन ख्वाबों को पूरा कर पायेंगे।





अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार दुनिया भर में 21 करोड़ से अधिक बच्चों से बाल मजदूरी करवाई जाती है। 71 देश ऐसे हैं जहां बच्चों को मजदूरी करने के लिए किसी न किसी रूप में मजबूर होना पड़ता है।





अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की नई रिपोर्ट 'फाइंडिंग्स ऑन द वर्स्ट फॉर्म्स ऑफ चाइल्ड लेबर' में 140 देशों का आंकलन किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि ऐसी 130 चीजें है जिन्हें बनाने के लिए बच्चों से काम करवाया जाता है। ईंटें तैयार करने से लेकर मोबाइल फोन के पुर्जे बनाने तक के कई काम बच्चों से लिए जाते है।





2001 के जनगणना के आंकड़ों अनुसार भारत में 5 से14 वर्ष की उम्र के 1 करोड़ 26 लाख 66 हजार 377 बच्चे बाल श्रम में लगे हुए थे। सरकारी नीतियों व सामाजिक विकास के कार्यक्रमों के चलते इसमें काफी कमी आयी है और यही आंकड़े इसी आयु वर्ग में 2011 की जनगणना के अनुसार कम होकर 43 लाख 53 हजार 247 तक आ गए। उतर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात में बाल मजदूरी की दर अन्य राज्यों से अधिक है। हालांकि भारत सरकार की तरफ से पिछले समय कोरोना आने के बाद से कोई रिपोर्ट जारी नही की गयी है।





एक सभ्य समाज में कोई मां-बाप नहीं चाहेगा कि उनकी बच्चे बीड़ी, पटाखे, माचिस, ईंटें, जूते, कांच की चूड़ियां, ताले, इत्र और फुटबॉल कालीन आदि बनवाने के कार्यों को करे।





बाल श्रम एक ऐसा शोषण है जो बच्चों से उनके निर्दोष बचपन के अधिकार को लूटता छीनता है। गरीबी और बाल श्रम का आपसी दुष्चक्र निरंतर चलता रहता है गरीबी से बाल श्रम होता है और बाल श्रम गरीबी के स्तर को बनाए रखता है।





दुनिया भर में हर दस में से एक बच्चा बाल मजदूर है। जबकि 2000 के बाद से बाल श्रम में बच्चों की संख्या में 9 करोड़ से ऊपर की गिरावट आई है। संयुक्त राष्ट्र सतत विकास ने 2025 तक बाल श्रम के सभी रूपों को समाप्त करने का लक्ष्य रखा है देखना होगा इस दिशा में विश्व समुदाय कैसे मजबूती से आगे बढ़ता है।





बाल श्रम को दूर करने के लिए देश के भीतर बहुत से कठोर कानून व नीतियां भी बनाई गई हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद-24 के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से कारखानों, फैक्ट्रियों व खानों में जोखिम भरे कार्य कराना अपराध है।





बाल अधिनियम-1933, बाल रोजगार अधिनियम -1938, भारतीय कारखाना अधिनियम-1948, बागान श्रम अधिनियम-1951, खान अधिनियम-1952, बाल श्रम गिरवीकरण अधिनियम तथा बाल श्रमिक प्रतिबंध एवं नियमन अधिनियम-1986 आदि कानून व नीतियां बाल मजदूरों की सेवाओं, कार्यदशाओं, कार्य के घंटे, मजदूरी दर आदि का नियमन करते हैं।





बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम 1986, के अनुसार "बच्चे" का मतलब है एक व्यक्ति जिसने अपनी उम्र के 14 वर्ष पूरा न किया हो। यह अधिनियम, अधिनियम की अनुसूची के भाग क एवं ख (धारा 3) में शामिल 18 व्यवसाय और 65 प्रक्रियाओं आदि उद्योगों में बच्चों की नियुक्ति को प्रतिबंधित करता है।





संविधान में स्थापित अनुच्छेद 21-क में बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार कानून उनको 6 से 14 साल की उम्र तक सरकार द्वारा क़ानून के जरिए निर्धारित रूप से निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का मौलिक अधिकार देता है।





ठीक इसी तरह अनुच्छेद-24 के तहत चौदह साल से कम उम्र के किसी भी बच्चे को किसी कारखाने या खदान या किसी अन्य खतरनाक रोजगार में नियोजित नहीं किया जाएगा। बाल श्रम एक ऐसा विषय है, जिस पर संघीय व राज्य सरकारें, दोनों कानून बना सकती हैं,लेकिन कानून कितने प्रभावी है इसकी बानगी उत्तर प्रदेश के कासगंज जनपद में सामने आई है,असिस्टेंट लेबर कमिश्नर हेमा टामटा कहती है हमने 2021 में कुल 6 जगह कार्यवाहियां की है जिसमे 3 लोगो को नोटिस दिए गए थे,वही 2022 में अभी तक कोई कार्यवाही नही की है,अब हम लोग कार्यवाही करने की रूपरेखा तैयार कर रहे है।





नाम चलाने के लिए कानून जितनी मर्जी हो बना दिए जाएं लेकिन जब तक धरातल पर इन्हें प्रभावशाली तरीके से लागू नहीं किया जा सकता तब तक बाल श्रम निषेध कानूनों की लिस्ट लंबी होती जायेगी और इन कानूनो के हाथ लंबे नहीं हो सकते।





इसके साथ ही समाज को भी बच्चों के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी। बच्चों को काम देने का अहसान करने की बजाए उसके व्यस्क अभिभावकों को रोजगार दिया जाना चाहिए जो कि एक प्रभावी कदम निखर करके सामने आ सकता है।





हम सबका एक दायित्व बनता है वह बचपन जिसमें बच्चा सपनों के पंखों से उड़ान भरना सीखता है उसमें इन पंखों को काट कर आपाहिज करने की बजाए खुला आसमान देने की जरूरत दिखाई देती है।





12 जून को भले ही पूरा विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मना रहा हो,लेकिन बाल श्रम दिवस मनाने से नहीं बच्चों को उनके अधिकार देने से रुकेगा।