विशेष संवाददाता

लखनऊ / नई दिल्ली:

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सुगबुगाहट तेज हो गई है। राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के प्रमुख डॉ. संजय निषाद ने एनडीए गठबंधन और भारतीय जनता पार्टी को कड़ी चेतावनी दी है। दिल्ली में आयोजित पार्टी के एक कार्यक्रम के दौरान और मीडिया से बातचीत में उन्होंने दो टूक कहा है कि यदि निषाद समाज के आरक्षण के मुद्दे पर जल्द कोई ठोस फैसला नहीं लिया गया, तो उनकी पार्टी 'दूसरा दरवाजा' (विकल्प) देखने के लिए मजबूर होगी।

‘बच्चा जब तक रोता नहीं, मां दूध नहीं पिलाती’

एबीपी न्यूज़ से हुई खास बातचीत में अपने तीखे तेवर और बयान के पीछे की वजह स्पष्ट करते हुए संजय निषाद ने कहा कि वे आज जो कुछ भी हैं, अपने समाज की वजह से हैं, इसलिए उनके लिए समाज के हितों की बात करना सबसे पहले आता है।

उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा:

"बच्चा जब तक रोता नहीं, तब तक मां उसे दूध नहीं पिलाती। अगर दूध नहीं मिलेगा, तो बच्चे को जिंदा रखने के लिए कुछ और करना ही पड़ेगा। मैं कोई भीख नहीं मांग रहा हूं, बल्कि अपने समाज के हक की वकालत कर रहा हूं।"

‘दिल्ली और यूपी में निषाद आरक्षण की स्थिति अलग क्यों?’

संजय निषाद ने भाजपा सरकार के सामने सवाल खड़े करते हुए कहा कि जब केंद्र और अन्य जगहों पर नीतियां तय होती हैं, तो विसंगतियां क्यों हैं? उन्होंने कहा:

  • "अगर सवर्णों को आरक्षण मिल सकता है, महिलाओं को आरक्षण मिल सकता है, तो निषाद समाज के साथ न्याय क्यों नहीं?"
  • उन्होंने सवाल उठाया कि दिल्ली के निषाद अनुसूचित वर्ग में आते हैं और उत्तर प्रदेश के निषाद अलग श्रेणी में, यह दोहरी व्यवस्था क्यों है?

उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वे चाहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी अपने ही पुराने वादों और इस लंबित मुद्दे को खुद हल करे। माई-बाप (सरकार) का काम बच्चे की समस्याओं का समाधान करना होता है। यदि खाने को नहीं मिलेगा, तो जिंदा रहने के लिए बच्चा कुछ भी सोचेगा। अभी उन्होंने बीजेपी को अपनी बात कह दी है, और आगे क्या करना है, यह उनका समाज तय करेगा।

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राजनीतिक हलचल और एनडीए पर असर

संजय निषाद के इस आक्रामक तेवर से उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। आगामी राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से निषाद समाज का समर्थन उत्तर प्रदेश के कई जिलों (विशेषकर पूर्वांचल क्षेत्र) में बेहद अहम माना जाता है। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले एनडीए के भीतर इस तरह की बयानबाजी गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े करती है। अब देखना यह होगा कि केंद्रीय नेतृत्व या प्रदेश संगठन इस मसले पर संजय निषाद को कैसे मनाता है और आगे क्या रुख अपनाता है।

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