लखनऊ।उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव खत्म हो चुके हैं और चुनाव के नतीजे भी आ गए हैं।भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड जीत हासिल की है।इस बार विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक झटका बहुजन समाज पार्टी को लगा है। 2007 के विधानसभा चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग के बलबूते पर उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनााने वाली बहुजन समाज पार्टी आज एक सीट पर आकर सिमट गयी है।एक दौर था जब दलित मायावती का कोर वोटर हुआ करता था,लेकिन पिछले पांच चुनावों में मिल रही हार से ऐसा लग रहा है कि एक तरफ जहां मायावती की सोशल इंजीनियरिंग ध्वस्त हो गई है तो वहीं दूसरी तरफ उनका कोर वोट बैंक भी बिखरता जा रहा है।

आइए जानते हैं कि वो कौन सी वजह हैं जो मायावती को आज एक सीट तक सिमटना पड़ा है।

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी को लगाातर पांच चुनावों में शिकस्त मिली है।इस बार विधानसभा चुनाव में केवल एक विधायक ने चुनाव जीता है।बहुजन समाज पार्टी को 12 फीसदी से अधिक वोट मिले हैं,लेकिन संख्या के आधार पर सिर्फ एक सीट ही जीत पाई है।खास बात ये है कि बहुजन समाज पार्टी का गढ़ कहे जाने वाले जिलों में भी पार्टी को भारी हार का सामना करना पड़ रहा है और 2017 के बाद ये बहुजन समाज पार्टी की लगातार दूसरी हार है।अगर 2007 के बाद से ही देखें तो बहुजन समाज पार्टी का 2012 के विधानसभा चुनाव, 2014 के लोकसभा चुनाव, 2017 के विधानसभा चुनाव और फिर 2014 में हुए आम चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन रहा है। बहुजन समाज पार्टी का वोट बैंक लगातार नीचे खिसकता चला गया। कभी 30 फीसदी वोट पाकर बहुमत की सरकार बनाने वाली मायावती आज 12 फीसदी पर सिमट कर रह गई हैं।

मायावती की दलित बाहुल्य सीटों पर भी ढीली हुई पकड़

2017 के विधानसभा चुनाव में मोदी नाम की आंधी के बाद भी बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 19 सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रही थी और अंबेडकरनगर में सबसे अधिक सीटें जीती थीं।लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी अपना किला भी नहीं बचा पाईं और राजनीतिक रूप से हाशिए पर चली गई हैं।

बसपा मुखिया मायावती पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आती हैं और बहुजन समाज पार्टी हमेशा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आगरा, और बिजनौर जैसे जिलों में जीत दर्ज की है और यहां अधिक सीटें जीती हैं।अगर 2007 की बात करें तो बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी और इसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश ने अहम भूमिका निभाई थी। 2012 से किस वजह से बहुजन समाज पार्टी का जनाधार घटने लगा और हालत ये है कि उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी एक सीट पर सिमट गई है।

नहीं चला मायावती का ब्राह्मण कार्ड

दलितों के अलावा बसपा मुखिया मायावती की सबसे बड़ी यूएसपी ब्राह्मणों का साथ होना भी रही है,लेकिन राष्ट्रीय फलक पर जैसे ही नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे रणनीतिकारों का उदय हुआ वैसे ही 2014 के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी ने दलित के साथ ही ब्राह्मण वोट बैंक में भी सेंध लगाने की कवायद शुरू कर दी थी।अब ऐसी हालत आ गई है कि मायावती के गढ़ आगरा मंडल में भारतीय जनता पार्टी ने जाटवों में बड़ी सेंधमारी की है तो ब्राह्मण समुदाय में एक सकारात्मक मैसेज देने में सफल रही है।मायावती ने इस बार भी विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल में ब्राह्मणों को काफी संख्या में टिकट दिया था,लेकिन उसका भी फायदा नहीं मिला है।

मुस्लिम के सपा में जाने से बसपा हुई कमजोर

इस बार विधानसभा चुनाव में भी बहुजन समाज पार्टी ने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले का इस्तेमाल किया था और इसी फॉर्मूले के आधार पर 2007 में सरकार बनाई थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी को वह समर्थन नहीं मिला जो पहले मिलता था।इसलिए बहुजन समाज पार्टी इन क्षेत्रों में पूरी तरह विफल साबित हुई है।आगरा में बहुजन समाज पार्टी एत्मादपुर, आगरा ग्रामीण, आगरा कैंट, फतेहपुर सीकरी और खेरागढ़ में चुनाव जीतती रही है लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में बुरी हार का सामना करना पड़ा है। दलित-मुस्लिम और ब्राह्मण के गठजोड़ से सरकार बनाने वाली बसपा मुखिया मायावती के पास अब इन तीन जातियों में से एक भी खड़ी नहीं दिख रही है।मुस्लिम इस बार लगभग समाजवादी पार्टी के साथ रहा।यही वजह है कि बसपा मुखिया मायावती अब ये बयान दे रही हैं कि मुस्लिमों ने समाजवादी पार्टी के साथ जाने की बड़ी भूल की है।भारतीय जनता पार्टी से केवल बहुजन समाज पार्टी ही मुकाबला कर सकती है।

कई करीबी नेताओं ने भी छोड़ा साथ

बहुजन समाज पार्टी को पहले भी कई नेता अलविदा कह चुके हैं और ये नेता पार्टी के स्तंभ हुआ करते थे।अंबेडकरनगर को बहुजन समाज पार्टी का गढ़ कहा जाता था,लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में यहां सबसे बड़ा झटका लगा है।इस जिले में कुल पांच विधानसभा सीटें हैं और पिछले चुनाव में बहुजन समाज पार्टी कटेहरी, जलालपुर और अकबरपुर जीतने में सफल रही थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में कटेहरी से लालजी वर्मा और अकबरपुर से रामचल राजभर ने चुनाव जीता था, लेकिन इस बार इन दोनों नेताओं ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा। बहुजन समाज पार्टी ने भी नए नेताओं पर दांव लगाया था,लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा।