रांची।झारखंड के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दवा और अन्य जरूरी सुविधाएं समय से दिलाने के लिए बनाई गई JMHIDPCL की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा हो रहा हैं। हालत यह है कि न तो समय पर दवा की खरीदारी हो पा रही है, न ही खरीदी गयी दवाओं की गुणवत्ता जांच समय पर हो पा रहा है। इसका खुलासा सीएजी द्वारा बीते साल की ऑडिट रिपोर्ट में किया गया है।

CAG की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2014 से 2019 के दौरान कुल 151.74 करोड़ की राशि दवाओं की उपलब्धता के लिए निगम को मिली। जिसमें 100.31 करोड़ राज्य निधि से और 51.43 करोड़ रुपए एनएचएम निधि से दिए गए थे, लेकिन राज्य निधि से मिली 100.31 करोड़ में से महज 12.46 करोड़ खर्च हो सके। शेष 87.85 करोड़ (88 प्रतिशत) स्वास्थ्य विभाग को वापस किया गया। वहीं एनएचएम निधि से मिली 51.43 करोड़ में से बची हुई 12.24 करोड़ निगम के खाते में पड़ी, ब्याज कमा रही थी।

झारखंड में राज्य की जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा के साथ अस्पतालों में जरूरी दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए जेएमएचआईडीपीसीएल (झारखंड मेडिकल एंड हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट एंड प्रोक्योरमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड) कार्यरत है।इस निगम को राज्य में दवाओं, उपकरण की खरीद वितरण एवं बुनियादी ढांचे का काम सौंपा गया है।

अस्पतालों में अधिकतम 20 प्रतिशत दवाएं उपलब्ध

अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता का आलम यह है कि सरकार द्वारा बनायी गयी 367 प्रकार की अत्यावश्यक दवाओं की सूची में से अस्पतालों में एक चौथाई दवाएं भी उपलब्ध नहीं रहती हैं। जिलों में दवाओं की उपलब्धता का आकलन के लिए एजी ने नमूना के तौर पर छह जिला (रांची, पूर्वी सिंहभूम, देवघर, हजारीबाग, पलामू, रामगढ़) अस्पतालों की जांच की। पाया गया कि 367 में से कहीं 11 तो कहीं अधिकतम 23 प्रकार की दवाएं ही उपलब्ध थी। और जिलों की बात तो दूर रांची में भी 367 में से महज 70 दवाएं, यानी महज 20 प्रतिशत दववाएं ही उपलब्ध पाई गयी। जबकि, 367 में से पूर्वी सिंहभूम में कुल 52, रामगढ़ 56, हजारीबाग 41, पलामू 51 और देवघर में सबसे ज्यादा 86 दवाएं उपलब्ध थी।

354 दवाओं की मांग, महज 46 की दर अनुमोदित

निगम की कार्यशैली से मरीजों को होने वाली परेशानियों का आकलन इस बात से सहज ही लगाया जा सकता है। स्वास्थ्य निदेशालय ने 2015 से 19 के बीच 213 और 354 प्रकार की दवाओं की मांग निगम (JMHIDPCL)से की थी। जिसमें से दवाओं की आपूर्ति तो दूर की बात है, पहले 47 और बाद में महज 48 प्रकार की दवाओं के लिए निगम द्वारा अनुबंध दर को अनुमोदित किया जा सका। CAG ने स्पष्ट कहा है कि जेएमएचआईडीपीसीएल द्वारा दवाओं की अपर्याप्त खरीद और आपूर्ति ने सिविल सर्जनों को जिला अस्पतालों में स्थानीय विक्रेताओं से दवाओं की खरीदारी के लिए विवश किया।

परीक्षण में विलंब से 83 लाख की दवा बर्बाद

जांच में पता चला कि निगम ने मार्च 2017 में 1.11 करोड़ के पोटैशियम क्लेवुनेट के साथ एमॉक्सीसिलिन की 24.71 लाख गोलियों की आपूर्ति के लिए कार्यादेश दिया। विक्रेता ने जून 2017 में पांच बैचों में 24.47 लाख गोली(निर्माण मई 2017, समाप्ति अक्टूबर 2018) आपूर्ति कर दिया। निगम ने पैनलबद्ध प्रयोगशाला से दवा के नमूने की जांच कराई। जुलाई 17 में दवा मानक के अनुरूप नहीं पाए गए। विक्रेता को 45 दिनों बाद निगम से यह सूचना दी गयी कि दवा मानक के अनुरूप नहीं हैं। विक्रेता ने इसका विरोध किया। तीन महीने बाद फिर से केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला, कोलकाता में जांच करायी गयी। दिसंबर में सीडीएल ने दवा को सही पाया। शेष तीन महीने के जीवनकाल के साथ 6 लाख गोली तो जिलों को भेज दिए गए, लेकिन 82.40 लाख की 18.39 लाख टैबलेट अक्टूबर 2018 में एक्सपायर हो गयी और निगम के गोदाम में ही पड़ी रह गयी।







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