दस का दम:सपा में स्वामी प्रसाद का जाना भाजपा के लिए खतरे की घंटी: धनंजय सिंह
दस का दम:सपा में स्वामी प्रसाद का जाना भाजपा के लिए क्यों है खतरे की घंटी: धनंजय सिंह <Br/> <Br/>
sanjay kumar📍 लखनऊ, उत्तर प्रदेश

लखनऊ।उत्तर प्रदेश में फिर से सत्ता में लौटने की चाहत लिए बैठी भारतीय जनता पार्टी को मंगलवार को बहुत बड़ा झटका लगा है।योगी मंत्रिमंडल के कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपनी ही सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए मंत्रीपद से इस्तीफा दे दिया और मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव से हाथ मिला लिया है।स्वामी प्रसाद मौर्य प्रदेश के बड़े ओबीसी नेता हैं और इसके चलते उनके समर्थक भी साइकिल की हैंडिल पकड़ कर पैडिल मार लेंगे इसमें किसी तरह से शक की कैई गुंजाइश नहीं है।
आइए जानें स्वामी का ये फैसला सत्ताधारी भाजपा के लिए क्यों बहुत बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
स्वामी प्रसाद मौर्य ये का कदम भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़ा झटका है।जिस दिन उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए भाजपा उम्मीदवारों को लेकर माथापच्ची करने में लगी रही,उस दिन कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे कद्दावर ओबीसी नेता का पार्टी और सरकार छोड़कर जाना निश्चित तौर पर सत्ताधारी भाजपा के लिए मामूली बात नहीं है।कभी बहुजन समाजवादी पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य का इस तरह से चुनाव मुहाने पर होने पर पार्टी से जाने का क्या मतलब है। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की ट्विटर पर लिखी इस लाइन से पता चलता है,आदरणीय स्वामी प्रसाद मौर्य जी ने किन कारणों से इस्तीफा दिया है मैं नहीं जानता हूं। उनसे अपील है कि बैठकर बात करें, जल्दबाजी में लिए हुए फैसले अक्सर गलत साबित होते हैं। उपमुख्यमंत्री को भले ही जल्दबाजी में लिया हुआ फैसला लग रहा हो, लेकिन 68 वर्षीय स्वामी प्रसाद मौर्य राजनीतिक बच्चे नही है बल्कि राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। उन्होंने जो भी कदम उठाया है,वो उनके अपने और अपने बच्चों के राजनीतिक भविष्य को तोल-मोल करके ही उठाया होगा।
स्वामी ने क्यों छोड़ी भाजपा
स्वामी प्रसाद मौर्य का अगर मौजूदा सियासी कद देखा जाए तो वो गैर-यादव ओबीसी के बड़े नेता तो हैं ही खुद कुशीनगर जिले की पडरौना विधानसभा सीट से विधायक हैं और इससे पहले रायबरेली जिले की ऊंचाहार विधानसभा सीट से दो बार विधायक रह चुके हैं। स्वामी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में अपने बेटे उत्कृष्ट मौर्य को ऊंचाहार विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर लड़ाया था,लेकिन समाजवादी पार्टी से हार गए थे। स्वामी 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर बदायूं सीट से अपनी बेटी संघमित्रा मौर्य को संसद भेजने में सफल हुए थे। जानकारों का मानना हैं कि स्वामी सपा की ताकने का एक कारण तो ये हो सकता है कि ऊंचाहार में यादव, मौर्य और मुसलमानों के सशक्त वोट बैंक के आधार पर वह अपने बेटे की सीट को सुरक्षित करना चाहते हैं। टिकट तो भाजपा भी दे देती, लेकिन शायद स्वामी दूसरी बार जोखिम नहीं उठाना चाहते थे।
भाजपा में नहीं मिल पा रहा था बसपा जैसा कद
स्वामी प्रसाद मौर्य का बहुजन समाज पार्टी में कद बहुत बड़ा था।बसपा से कई बार विधायक रहे और एमएलसी भी रहे।बसपा मुखिया मायावती के सबसे करीबी नेता हुआ करते थे।बसपा ने स्वामी को प्रदेश अध्यक्ष से लेकर राष्ट्रीय महासचिव तक का दर्जा दिया था,लेकिन भाजपा के राजनीतिक ढांचे में स्वामी अपने लिए उतनी बड़ी हैसियत का जुगाड़ नहीं बैठा पा रहे थे।शायद इसलिए स्वामी को लगता है कि उनके लिए दलित और पिछड़ों की राजनीति करने के लिए समाजवादी पार्टी में अधिक गुंजाइश हो सकती है।क्योंकि उत्तर प्रदेश में पहले दौर के चुनाव से एक महीने से भी कम समय रहने पर उनको अचानक महसूस हुआ है कि जिस भाजपा सरकार में वे मंत्री थे, उसमें 'दलितों, पिछड़ों, किसानों, बेरोजगार नौजवानों और छोटे-लघु, मध्यम श्रेणी के व्यापरियों की घोर उपेक्षा हो रही है। स्वामी ने राज्यपाल आनंदी बेन पटेल को भेजे अपने इस्तीफे में यही लिखा है।
स्वामी के आने से सपा को क्या फायदा
स्वामी प्रसाद मौर्य समर्थक कुछ और विधायक भी साइकिल पर सवार होकर पैडिल मारना तय माना जा रहा है।सपा मुखिया अखिलेश यादव की ये पूरी कवायद नॉन-यादव ओबीसी वोटों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाने की है,जिसमें पिछले दो लोकसभा और एक विधानसभा चुनाव में भाजपा भारी पड़ रही है। नॉन-यादव वोटरों में पैठ कैसे बढ़े इसको लेकर सपा सक्रिय रही है, खासकर इस चुनाव में।ओम प्रकाश राजभर समेत कई छोटे-छोटे दलों के साथ पार्टी ने गठबंधन किया है,लेकिन स्वामी ने चुनाव के इतने नजदीक आने पर ऐसा क्यों किया। निश्चित तौर पर चाचा और भतीजा के बीच जो सियासी दूरी कम हुई है उसका ये एक आफ्टर इफेक्ट है।इस रूप में देखा जाए तो भाजपा से किसी नेता का अलग होना जितना महत्वपूर्ण है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है उसका विपक्ष के साथ जाकर जुड़ जाना। आमने-सामने की लड़ाई में जहां स्वामी भाजपा को कमजोर कर रहे हैं तो वहीं सपा को मजबूत कर रहे हैं।
भाजपा के लिए क्यों है खतरे की घंटी
ये बात सही है कि पिछले तीन चुनावों से भारतीय जनता पार्टी ने यूपी में वोटरों का अपना जो समीकरण तैयार किया है उसमें गैर-यादव ओबीसी वोटरों की बहुत बड़ी भूमिका रही है।सपा मुखिया अखिलेश यादव और उनकी सपा निश्चित तौर पर इसमें पिछड़ती रही है,लेकिन अब भाजपा का एक बड़ा कद्दावर ओबीसी चेहरे का इस तरह से विरोधी खेमे में जाना निश्चित तौर पर भाजपा के नीति-निर्धारकों के लिए चिंता की बात हो सकती है।कुल मिलाकर ये चुनावी फिजा को भी बताता है कि आज भाजपा और सपा के बीच सीधा मुकाबला है,और इस चुनावी मुकाबले में कोई सपा को अपनी ठौर के तौर पर देखता है, वह भी ओबीसी वर्ग का कद्दावर नेता तो ये निश्चित रूप से भाजपा के लिए अच्छा संकेत नहीं है, और खासकर तब जब ओबीसी वोटर जिसका ज्यादा हिस्सा इस समय भाजपा के साथ है।उस हिस्से से छूटकर या टूटकर नेताओं का जाना भाजपा के लिए खतरे की घंटी है।
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