नई दिल्ली: भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने देश में नए मतदाताओं (New Voters) के पंजीकरण की प्रक्रिया को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नीतिगत फैसला लिया है। आयोग ने अपने आधिकारिक पोर्टल 'ECINet' पर नए वोटर कार्ड आवेदन के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 से स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े अनिवार्य 'घोषणा पत्र' (Declaration) को पूरी तरह अलग कर दिया है।

यह नई व्यवस्था उन सभी राज्यों में तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है, जहां वर्तमान में SIR की प्रक्रिया चल रही है। इस निर्णय के साथ ही Form 6 के प्रारूप को लेकर पिछले कई महीनों से आयोग के भीतर और बाहर जारी विवाद पर पूरी तरह विराम लग गया है।

क्या था SIR घोषणा पत्र और क्यों उपजा विवाद?

ऑनलाइन Form 6 में सेक्शन J और K के बीच एक अतिरिक्त घोषणा पत्र जोड़ा गया था, जिसके तहत नए आवेदकों के लिए तीन में से किसी एक विकल्प को चुनना तकनीकी रूप से अनिवार्य कर दिया गया था:

  1. आवेदक का नाम 2000 के शुरुआती वर्षों में हुई पिछली SIR मतदाता सूची में दर्ज था।
  2. आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस पुरानी सूची में शामिल था।
  3. न तो आवेदक का और न ही उसके माता-पिता का नाम पिछली SIR सूची में था।

इस घोषणा पत्र को भरे बिना फॉर्म सबमिट होना असंभव था। कानूनी जानकारों और आलोचकों का मानना था कि यह शर्त नए और युवा मतदाताओं के लिए बेवजह की कागजी बाधाएं खड़ी कर रही थी।

दो चुनाव आयुक्तों ने बताया था 'गैरकानूनी और अनधिकृत'

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, आयोग के दो चुनाव आयुक्तों—विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू—ने इस बदलाव का कड़ा विरोध किया था:

  • 16 मई: चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने टिप्पणी की कि वैधानिक कानूनी संशोधन के बिना Form 6 के मूल प्रारूप में कोई फेरबदल नहीं किया जा सकता।
  • 13 अगस्त: चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इस बदलाव को 'अनधिकृत और गैरकानूनी' बताते हुए तुरंत हटाने के निर्देश दिए।

दोनों आयुक्तों का वैधानिक तर्क था कि Form 6 का प्रारूप 'रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960' के तहत तय है। इसमें किसी भी तरह का संशोधन करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है, चुनाव आयोग अपने स्तर पर इसे नहीं बदल सकता।

सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा और आयोग का बदलता रुख

26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में चुनाव आयोग ने बताया कि उसकी इलेक्टोरल रोल डिवीजन ने 21 अक्टूबर को इस घोषणा पत्र को Form 6 से अलग करने का अंतिम निर्णय लिया।

गौरतलब है कि पिछले 6 हफ्तों में आयोग ने इस मुद्दे पर 3 बार अपना रुख बदला:

  • जुलाई: आयुक्तों के विरोध के बावजूद इसे पोर्टल से जोड़ा गया।
  • 26 सितंबर: पूर्ण आयोग की बैठक में तय हुआ कि जहां SIR पूरा हो गया है, केवल वहीं से इसे हटाया जाए।
  • 21 अक्टूबर (पूर्ण वापसी): 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा संशोधित Form 6 को कानूनी हरी झंडी न देने की बात स्पष्ट करने के बाद आयोग ने सभी राज्यों में इसे Form 6 से पूरी तरह अलग कर दिया।

10 महीने में 14 बार दर्ज हुईं अंदरूनी आपत्तियां

आयोग के आंतरिक दस्तावेजों से यह भी सामने आया है कि पिछले 10 महीनों में आयुक्त संधू और जोशी ने आयोग द्वारा लिए गए फैसलों पर कम से कम 14 बार गंभीर आपत्तियां दर्ज कराईं। ये आपत्तियां मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने व जोड़ने, अपीलों की प्रक्रिया और IT सॉफ्टवेयर संचालन से संबंधित थीं।

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कार्यप्रणाली में सुधार और ECINet का स्वतंत्र ऑडिट

इन आंतरिक मतभेदों के बाद चुनाव आयोग ने अपनी प्रशासनिक व्यवस्था में कई बड़े सुधारात्मक कदम उठाए हैं:

  • बैठकों का एजेंडा व मिनट्स: बैठकों का आधिकारिक एजेंडा अब पहले से साझा किया जाएगा और विस्तृत मिनट्स जारी होंगे। अधिकारियों की विदेश यात्राओं के लिए आयोग की पूर्व औपचारिक मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है।
  • IT सिस्टम का स्वतंत्र ऑडिट: महानिदेशक (IT) सीमा खन्ना के अधीन तैयार होने वाले सभी IT मॉड्यूल अब पहले वरिष्ठ अधिकारियों की समिति और फिर आयोग की मंजूरी के बाद ही लागू होंगे।
  • तकनीकी समिति का गठन: 14 अक्टूबर को एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई है (जिसमें IIT बॉम्बे और IISc बेंगलुरु के विशेषज्ञ शामिल हैं), जो 'ECINet' सॉफ्टवेयर के वैधानिक अनुपालन की जांच करेगी।
  • फील्ड अफसरों को राहत: फील्ड स्तर के अधिकारियों (ERO और DEO) को अधिक अधिकार दिए गए हैं, ताकि मामूली तकनीकी त्रुटियों के लिए मतदाताओं की व्यक्तिगत पेशी अनिवार्य न हो और BLO घर जाकर दस्तावेज सत्यापित कर सकें।

इसके साथ ही, आयोग ने 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर शुरू किया है, ताकि वर्ष 2027 में 18 साल के होने वाले युवाओं को बिना किसी अतिरिक्त घोषणा पत्र के आसानी से मतदाता सूची में जोड़ा जा सके।

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