"
रांची। झारखंड: झारखंड कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित JSSC CGL परीक्षा रद्द करने के निर्णय के खिलाफ सफल अभ्यर्थियों का आक्रोश चरम पर पहुंच गया है। बुधवार को रांची स्थित सचिवालय (प्रोजेक्ट भवन) के बाहर प्रदर्शन कर रहे सैकड़ों अभ्यर्थी बारिश के बीच अचानक सुरक्षा घेरा तोड़कर परिसर के अंदर दाखिल हो गए और सड़क पर बैठकर सरकार विरोधी नारेबाजी की।
सदन से सड़क तक विरोध की मुख्य वजहें
- 12 साल का संघर्ष दांव पर: अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने 12 वर्षों की कड़ी मेहनत और कानूनी लड़ाइयों के बाद यह परीक्षा पास की थी। दस्तावेज सत्यापन (Document Verification) की प्रक्रिया पूरी होने के बाद कई अभ्यर्थी विभिन्न सरकारी विभागों में कार्यरत भी थे, जिन्हें अब नौकरी जाने का सीधा डर सता रहा है।
- दोषियों पर कार्रवाई की मांग: प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि यदि परीक्षा प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की अनियमितता हुई है, तो CID जांच के जरिए सिर्फ धांधली करने वाले दोषियों को चिन्हित कर सजा दी जानी चाहिए। सभी सफल अभ्यर्थियों की नियुक्ति रद्द करना सरासर अन्याय है।
- टेंट हटाने पर नाराजगी: अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि बारिश से बचाव के लिए लगाया गया उनका टेंट रात में हटा दिया गया, जिसके बावजूद वे तेज बारिश में सड़क पर डटे रहे।
क्यों रद्द हुईं परीक्षाएं?
उल्लेखनीय है कि झारखंड सरकार ने 18 अगस्त की देर रात CID जांच रिपोर्ट और परीक्षा में बड़े पैमाने पर हुई अनियमितताओं की शिकायतों को आधार बनाते हुए JSSC CGL सहित कुल 22 भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने का कड़ा फैसला लिया था।
अभ्यर्थियों का कहना है कि जब तक सरकार अपने फैसले पर पुनर्विचार नहीं करती और निष्पक्ष अभ्यर्थियों के हक में निर्णय नहीं लेती, उनका आंदोलन जारी रहेगा।
झारखंड में परीक्षा धांधली के खिलाफ छात्रों के 26 दिनों से जारी भारी विरोध-प्रदर्शन के दबाव में आकर हेमंत सोरेन सरकार ने JSSC-CGL समेत कई परीक्षाओं को रद्द करने और वर्ष 2014 से हुई नियुक्तियों की उच्चस्तरीय जांच का आदेश दिया है। सरकार का यह फैसला पहली नजर में प्रदर्शनकारी छात्रों की बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इस कदम ने एक और गंभीर प्रशासनिक व नैतिक संकट खड़ा कर दिया है। परीक्षा रद्द होने से अपनी योग्यता के बल पर चयनित होकर पिछले काफी समय से विभिन्न सरकारी पदों पर कार्यरत हजारों कर्मचारियों के भविष्य पर अचानक अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।
मंगलवार को रांची में भारी बारिश के बीच प्रोजेक्ट भवन के बाहर पहुंचे कर्मचारियों ने सरकार के इस एकतरफा फैसले के खिलाफ जोरदार विरोध दर्ज कराया। खूंटी में पदस्थ लेबर एनफोर्समेंट ऑफिसर और एएसओ (ASO) के पद पर कार्यरत कर्मियों ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए स्पष्ट किया कि उनकी नियुक्तियां पूर्व में सुप्रीम कोर्ट के 141 पन्नों के स्पष्ट आदेश के बाद हुई थीं।
झारखंड सरकार के इस विवादित फैसले से उभरे प्रमुख सवाल व तथ्य:
- निर्दोषों पर कार्रवाई का सवाल: विरोध दर्ज करा रहे कर्मचारियों का सीधा सवाल है कि यदि 100 में से 5 लोगों ने धांधली की है, तो बाकी 95% मेहनत करने वाले अभ्यर्थियों की नौकरी छीनना कहां का न्याय है? न्यायशास्त्र का सिद्धांत कहता है कि भले 100 दोषी छूट जाएं, लेकिन किसी एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए।
- जांच से पहले ही फैसला क्यों?: विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को पहले स्वतंत्र एजेंसी या सीबीआई (CBI) के जरिए निष्पक्ष जांच करानी चाहिए थी। जांच में दोषियों को चिह्नित कर बाहर किया जाना चाहिए था। बिना विस्तृत रिपोर्ट के पूरी परीक्षा और नियुक्तियों को रद्द करना प्रशासनिक जल्दबाजी को दर्शाता है।
- कर्मचारियों का सामाजिक व आर्थिक नुकसान: चयनित उम्मीदवार कई महीनों से नौकरी में थे, वेतन पा रहे थे और उसी आधार पर जीवन के कई अहम फैसले (नौकरी छोड़ना, कर्ज लेना, शादी आदि) ले चुके थे। यदि जांच के बाद ये कर्मचारी निर्दोष साबित होते हैं, तो उनके मानसिक उत्पीड़न, वरिष्ठता और समय के नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
- आंदोलन अब भी जारी: सरकार के इस फैसले से जहां एक तरफ कार्यरत कर्मचारियों में तीखा आक्रोश फैल गया है, वहीं दूसरी तरफ प्रदर्शनकारी छात्र नेता भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। छात्र संगठन अब भी मामले की सीबीआई जांच और हाईकोर्ट के सिटिंग जज की अध्यक्षता में न्यायिक समिति के गठन की मांग पर अड़े हैं।
कानूनी जानकारों का मानना है कि मामला अदालत के दरवाजे तक पहुंचना तय है। यदि हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में यह विषय जाता है, तो सरकार को यह साबित करना होगा कि क्या पूरी परीक्षा प्रक्रिया इतनी दूषित थी कि केवल निर्दोषों को सजा दिए बिना दोषियों को अलग कर पाना पूरी तरह असंभव था।





