वॉशिंगटन/नई दिल्ली: मध्य-पूर्व (Middle East) में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में मचे हाहाकार को शांत करने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक चौंकाने वाला रणनीतिक कदम उठाया है। ट्रंप प्रशासन ने अन्य देशों को रूस से तेल खरीदने की अस्थायी अनुमति (Temporary Authorization) देने की घोषणा की है, ताकि आसमान छूती तेल की कीमतों पर लगाम लगाई जा सके।
क्यों लिया गया यह फैसला?
युद्ध के कारण सप्लाई चेन बाधित होने से कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच रही हैं। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर इस फैसले की पुष्टि करते हुए इसे "ऊर्जा बाजार में स्थिरता लाने वाला निर्णायक कदम" बताया।
निर्णय के मुख्य बिंदु:
फंसा हुआ तेल: यह छूट केवल उस तेल पर लागू होगी जो वर्तमान में जहाजों पर लदा हुआ है और समुद्र में फंसा हुआ है।
अल्पकालिक उपाय: यह एक विशेष रूप से तैयार किया गया 'शॉर्ट-टर्म' कदम है, न कि रूस पर लगे प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाना।
रूस को लाभ नहीं: बेसेंट के अनुसार, इससे रूसी सरकार को कोई बड़ा वित्तीय लाभ नहीं होगा क्योंकि रूस का मुख्य राजस्व तेल निष्कर्षण (Extraction) पर लगने वाले करों से आता है, जो पहले ही वसूले जा चुके हैं।
भारत के लिए क्या हैं इसके मायने?
इससे पहले अमेरिका ने संकेत दिए थे कि वह भारत को भी रूस से तेल खरीदने की छूट दे सकता है। वर्तमान स्थिति में इस फैसले के निम्नलिखित प्रभाव होंगे:
सस्ती आपूर्ति: भारत जैसे बड़े आयातक देशों को समुद्र में फंसे हुए कार्गो से सस्ता तेल मिलने की संभावना बढ़ेगी।
घरेलू कीमतों पर राहत: वैश्विक स्तर पर कीमतों में गिरावट आने से भारतीय उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल-डीजल की दरें स्थिर रह सकती हैं।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था और 'एनर्जी-प्रो' नीतियां
ट्रेजरी सेक्रेटरी ने ट्रंप की नीतियों की सराहना करते हुए कहा कि अमेरिका में तेल और गैस का उत्पादन पहले से ही रिकॉर्ड स्तर पर है। उन्होंने स्पष्ट किया:
"तेल की कीमतों में यह अस्थायी उछाल एक 'क्षणिक बाधा' है। ट्रंप प्रशासन की ऊर्जा-समर्थक नीतियों से न केवल अमेरिकियों को सस्ता ईंधन मिलेगा, बल्कि लंबी अवधि में वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।"
भविष्य की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम एक तीर से दो निशाने साधने जैसा है। एक तरफ अमेरिका मध्य-पूर्व के युद्ध के कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट को नियंत्रित कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह वैश्विक बाजारों में अपनी धाक और नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।





