नेपाल। हिमालय की गोद में बसी भोटे कोशी घाटी में आई भीषण अचानक बाढ़ (Flash Flood) ने 260 से अधिक वर्षों से भारत, नेपाल, चीन और तिब्बत को जोड़ने वाले ऐतिहासिक 'रसुवागढ़ी कॉरिडोर' को तहस-नहस कर दिया है। प्राचीन समय में खच्चरों और कारवां से होने वाले व्यापार का यह गढ़, वर्तमान में चीन से आने वाली इलेक्ट्रिक गाड़ियों और इलेक्ट्रॉनिक्स का मुख्य प्रवेश द्वार था, जो अब मलबे और पानी के तेज बहाव में तब्दील हो चुका है।

नमक और अनाज के व्यापार से शुरू हुआ था सफर

रसुवागढ़ी केवल एक व्यापारिक रास्ता नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक धरोहर है। ट्रकों के आने से सदियों पहले नेपाल से खच्चरों के काफिले चावल और अनाज लेकर उत्तर में ग्यारोंग तक जाते थे और बदले में तिब्बती नमक और ऊन लाते थे। यह नमक भारत तक पहुंचता था। व्यापारिक लाभ के लिए नेवार समुदाय तिब्बत के कस्बों में बसा और गोरखा राजाओं ने 1744 में नुवाकोट पर कब्जा कर इसी कॉरिडोर के जरिए व्यापार पर नियंत्रण जमाया।

1788 और 1791 के युद्धों में नेपाली सेनाओं ने इसी मार्ग का इस्तेमाल किया। इसके बाद, 1855 के संघर्ष के दौरान जंग बहादुर राणा ने सीमा पर ऐतिहासिक रसुवागढ़ी किला बनवाया, जो आज 171 साल बाद भी आधुनिक कस्टम्स क्रॉसिंग के पास मजबूती से खड़ा है।

इलेक्ट्रिक वाहनों का हब और बढ़ता आपदा का खतरा

समय के साथ कारवां अर्थव्यवस्था का रूप बदला और यह मार्ग नेपाल के लिए एक आधुनिक व्यापारिक केंद्र बन गया। हाल के वर्षों में रसुवागढ़ी चीन से आने वाली इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) का मुख्य एंट्री पॉइंट बन चुका था। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में इस सीमा से 6,500 से अधिक चीनी ईवी (कार, जीप और मिनीबसें) नेपाल में दाखिल हुईं।

हालाँकि, सीमा शुल्क (कस्टम्स) क्षेत्र में हर समय गाड़ियों और सामान का भारी जमावड़ा रहने के कारण इस संवेदनशील पहाड़ी इलाके में आपदा का जोखिम लगातार बढ़ रहा था।

ताजा बाढ़ ने मचाई भयंकर तबाही

हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ ने इस पूरे कॉरिडोर को मलबे के ढेर में बदल दिया:

  • बह गए शिपिंग कंटेनर: तिमुरे नदी के किनारे खड़े सैकड़ों 40-फीट के भारी शिपिंग कंटेनर उफान मारती धारा में बह गए। पानी में तैरते ये लोहे के कंटेनर मिसाइल की तरह पुल के खंभों, सड़कों और बिजली के टावरों से टकराते रहे, जिससे भारी बुनियादी ढांचा तबाह हो गया।
  • फ्रेंडशिप ब्रिज ध्वस्त: नेपाल और चीन को जोड़ने वाली ल्हेन्डे/कोशी नदी पर बना 'मितरी संघु' (फ्रेंडशिप ब्रिज) बाढ़ के प्रचंड वेग को झेल नहीं सका। 2015 के भूकंप और उसके बाद की बाढ़ के बावजूद बार-बार बनाया गया यह पुल चंद सेकंडों में ढह गया, जिससे दोनों देशों के बीच जमीनी संपर्क पूरी तरह कट गया है।

जिस रास्ते से कभी सदियों तक नमक, ऊन और चावल का व्यापार होता था, आज उस ऐतिहासिक मार्ग के ठप हो जाने से नेपाल का चीन के साथ जमीनी व्यापार पूरी तरह से ठप हो गया है।