नई दिल्ली: वैश्विक उत्सर्जन और तेजी से प्रभावी हो रहे 'अल नीनो' (El Niño) के प्रभाव से दुनिया भर के महासागर अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे हैं। यूरोपीय संघ की 'कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस' (C3S) के आंकड़ों के अनुसार, महासागरों के सतह का औसतन तापमान 21.1°C के रिकॉर्ड स्तर पर दर्ज किया गया है। जीवाश्म ईंधन जलाने से उत्पन्न 90% से अधिक अतिरिक्त गर्मी महासागरों द्वारा अवशोषित की जा रही है, जो धरती के प्राकृतिक बचाव तंत्र को कमजोर कर रही है।
महासागरीय गर्मी और अल नीनो के प्रमुख प्रभाव:
- जलवायु परिवर्तन व मानसून पर असर: अल नीनो के प्रभाव से भारत में मानसूनी बारिश में कमी, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया के जंगलों में भयंकर आग का खतरा बढ़ गया है।
- समुद्री हीटवेव की तिगुनी वृद्धि: 1990 के दशक की तुलना में दुनिया भर में समुद्री हीटवेव वाले दिनों की संख्या में 3 गुना से अधिक की बढ़ोतरी हुई है।
- समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी: पानी के थर्मल एक्सपेंशन (Thermal Expansion) के कारण जलस्तर बढ़ रहा है, जिससे तटीय इलाकों और द्वीपीय देशों में बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है।
- तूफानों की तीव्रता: गर्म महासागर वायुमंडल में अधिक ऊर्जा और जलवाष्प भेजते हैं, जिससे चक्रवाती तूफान और बारिश अत्यधिक विनाशकारी रूप ले रहे हैं।
वैज्ञानिकों के सुझाव और समाधान:
| क्षेत्रआवश्यक कदम | |
| उत्सर्जन में कटौती | जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) के उपयोग और कार्बन उत्सर्जन को तेजी से घटाना। |
| पारिस्थितिकी संरक्षण | मैंग्रोव, केल्प बेड (Kelp beds) और दलदली क्षेत्रों की रक्षा करना, जो प्राकृतिक कार्बन सिंक का काम करते हैं। |
| ग्लोबल 30x30 लक्ष्य | 2030 तक धरती और महासागरों के कम से कम 30% हिस्से को संरक्षित करने के वैश्विक वादे को जमीनी स्तर पर लागू करना। |
C3S की डॉक्टर सामंथा बर्गेस और 'कैंपेन फॉर नेचर' के ब्रायन ओ’डोनेल के अनुसार, यदि समय रहते तटीय और समुद्री इकोसिस्टम की सुरक्षा नहीं की गई, तो तटीय समुदायों की आजीविका और समुद्री जीवन दोनों पूरी तरह नष्ट हो जाएंगे।





