काठमांडू

बुधवार को आई भयानक फ्लैश फ्लड (आकस्मिक बाढ़) के बाद नेपाल इस सदी की सबसे भीषण प्राकृतिक त्रासदियों में से एक से जूझ रहा है। भोटे कोशी और त्रिशूली कॉरिडोर के आसपास तबाही का मंजर है, जहाँ उफनती नदियों के तेज बहाव में सैकड़ों घर और लोग बह गए। नेपाल पुलिस द्वारा शुक्रवार को जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस जलप्रलय में मरने वालों की संख्या बढ़कर 469 तक पहुंच गई है। जबकि आपदा प्रबंधन अधिकारियों का अनुमान है कि 28 पुलिसकर्मियों सहित लगभग 1,000 लोग अभी भी लापता हैं। अब तक 1,545 लोगों को सुरक्षित बचाकर निकाला जा चुका है।

आत्मनिर्भरता पर जोर: विदेशी सहायता से इनकार

संकट की इस घड़ी में भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों ने अपनी विशेषज्ञ बचाव टीमों (जैसे भारत की NDRF) को नेपाल भेजने की पेशकश की थी। हालांकि, नेपाल सरकार ने इन सभी अंतरराष्ट्रीय प्रस्तावों को विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया है।

नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर छेत्री ने शुक्रवार को सरकार के रुख को स्पष्ट करते हुए कहा:

"मित्र राष्ट्रों से मदद की पेशकश स्वाभाविक है और हम इसकी सराहना करते हैं। लेकिन हमारी अपनी सुरक्षा एजेंसियां खोज और बचाव अभियान पूरी क्षमता के साथ चला रही हैं। फिलहाल हमें किसी बाहरी देश की रेस्क्यू टीम की आवश्यकता नहीं है।"

2015 के कड़वे अनुभवों से ली सीख

नेपाली मीडिया और 'द काठमांडू पोस्ट' की रिपोर्टों के अनुसार, सरकार का यह फैसला 2015 के विनाशकारी भूकंप के समय मिले कड़वे अनुभवों पर आधारित है। उस समय बड़ी संख्या में विदेशी टीमों के आगमन से समन्वय और लॉजिस्टिक्स (सप्लाई चेन) में भारी अव्यवस्था पैदा हो गई थी।

विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, "हमें चीन और अन्य देशों से रेस्क्यू टीम भेजने के अनुरोध मिले थे, लेकिन 2015 के सबक को ध्यान में रखते हुए हमें इन्हें अस्वीकार करना पड़ा।" नेपाल सरकार का मानना है कि उनकी नेपाली सेना, सशस्त्र पुलिस बल और नेपाल पुलिस राहत व बचाव कार्यों को स्वयं संभालने में पूरी तरह सक्षम हैं।