पटना: बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुए लगभग एक दशक बीत चुका है, लेकिन एक ताजा आर्थिक अध्ययन रिपोर्ट ने इस नीति पर नए सिरे से राजनीतिक और प्रशासनिक बहस छेड़ दी है। देश के प्रतिष्ठित नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि राज्य में शराबबंदी को समाप्त कर नियंत्रित तरीके से बिक्री और आबकारी व्यवस्था बहाल की जानी चाहिए।
रिपोर्ट के अनुसार, इस कदम से बिहार सरकार के राजस्व में लगभग 14 से 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। इसके अलावा रिपोर्ट में अवैध शराब की तस्करी, नए प्रकार के नशीले पदार्थों के बढ़ते उपयोग और कानून के क्रियान्वयन में आ रही चुनौतियों का भी प्रमुखता से जिक्र किया गया है।
इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तैरने लगा है कि क्या भाजपा के नेतृत्व वाली सम्राट चौधरी सरकार इस नीति में कोई बदलाव करेगी?
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: समर्थन, विरोध और समीक्षा की मांग
- जदयू का स्पष्ट रुख (कोई समीक्षा नहीं):
- सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल जनता दल (यूनाइटेड) ने किसी भी प्रकार की समीक्षा या शराबबंदी हटाने की संभावना को साफ खारिज कर दिया है। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि अप्रैल 2016 में लागू यह नीति पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामाजिक सुधार एजेंडे का ऐतिहासिक हिस्सा रही है। इससे ग्रामीण महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार हुआ है और पारिवारिक बचत में बढ़ोतरी हुई है।
- गुजरात मॉडल की मांग (जीतने राम मांझी):
- केंद्रीय मंत्री और 'हम' पार्टी के प्रमुख जीतन राम मांझी ने कानून के जमीनी क्रियान्वयन में आ रही कमियों को देखते हुए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से आग्रह किया है कि बिहार में गुजरात की तर्ज पर शराबबंदी मॉडल लागू किया जाए।
- विपक्ष का हमला (भाई वीरेंद्र - राजद):
- राष्ट्रीय जनता दल (राजद) विधायक भाई वीरेंद्र ने कहा कि शराबबंदी बिना किसी ठोस सर्वे के जल्दबाजी में लागू की गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि सीमाओं से शराब की तस्करी रुक नहीं रही है और कार्रवाई के नाम पर केवल कुछ गाड़ियों को पकड़कर खानापूर्ति की जाती है। हालांकि, उन्होंने भी कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की वकालत की।
- भाजपा का रुख (कैबिनेट का सामूहिक निर्णय):
- भाजपा प्रवक्ता कुंतल कृष्ण के अनुसार, सरकार समय-समय पर आने वाली शोध रिपोर्टों का अध्ययन करती है। 2016 में शराबबंदी का फैसला सभी दलों की सहमति से लिया गया था और राज्य की जनता ने आम चुनावों में इस फैसले पर अपनी मुहर लगाई है। उन्होंने कहा कि फिलहाल राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू है और भविष्य में किसी भी बदलाव का फैसला कैबिनेट द्वारा सामूहिक रूप से लिया जाएगा।
आर्थिक व सामाजिक समीकरणों के बीच फंसा मुद्दा
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब राज्य सरकार आर्थिक संसाधनों को जुटाने और प्रशासनिक व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की कोशिश में जुटी है। एक तरफ जहां 14-15% अतिरिक्त राजस्व का आर्थिक तर्क है, वहीं दूसरी तरफ महिलाओं की सुरक्षा, सामाजिक बदलाव और राजनीतिक प्रतिबद्धता का मुद्दा है।
फिलहाल मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और एनडीए गठबंधन के शीर्ष नेतृत्व ने इस बात के संकेत दिए हैं कि नीति अपने मूल रूप में जारी रहेगी, लेकिन नई रिपोर्ट के बाद उपजी राजनीतिक बहस थमने का नाम नहीं ले रही है।





