पटना। बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के एक बयान ने राज्य की वित्तीय सेहत को लेकर नई बहस छेड़ दी है। तेजस्वी यादव का दावा है कि राज्य सरकार का खजाना पूरी तरह खाली हो चुका है, स्थिति दयनीय है और कर्मचारियों के वेतन तथा पेंशन तक का भुगतान करने के लिए आपातकालीन फंड (Emergency Fund) का सहारा लेना पड़ रहा है। इस राजनीतिक घमासान के बीच नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट और बजटीय आंकड़े बिहार की अर्थव्यवस्था की एक बेहद पेचीदा और चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं।
अपनी कमाई सीमित, केंद्र के अनुदान पर भारी निर्भरता
बिहार की अर्थव्यवस्था का सबसे वित्तीय पहलू यह है कि राज्य का स्वयं का राजस्व संग्रह काफी कम है। आंकड़े बताते हैं कि बिहार का अपना राजस्व (Revenue) उसकी राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का महज 7 प्रतिशत है। इसके विपरीत, राज्य कल्याणकारी और सामाजिक योजनाओं पर अपनी जीडीपी का 25 से 30 प्रतिशत तक खर्च करता है।
यदि बिहार सरकार के ₹100 की आय का ढांचा देखें, तो निर्भरता साफ नजर आती है:
- राज्य का अपना राजस्व: ₹21.78
- केंद्रीय करों में राज्य का हिस्सा: ₹45.49
- केंद्र सरकार से अनुदान (Subsidy/Grant): ₹14.92
- ऋण (Loan) से प्राप्त राशि: ₹17.81
यानी राज्य सरकार की कुल कमाई का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा केंद्रीय हस्तांतरण और कर्ज पर ही टिका है।
बजट ₹3.47 लाख करोड़ का, लेकिन खर्चों की अपनी सीमाएं
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बिहार सरकार ने ₹3,47,589.76 करोड़ का ऐतिहासिक बजट पेश किया है। लेकिन इस भारी-भरकम राशि का बड़ा हिस्सा विकास कार्यों के बजाय पुरानी देनदारियों में चला जाता है। बीते आंकड़ों के मुताबिक, बजट का लगभग 84 प्रतिशत हिस्सा सरकारी कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, पुराने बकायों के ब्याज, प्रशासनिक लागत और पहले से जारी प्रतिबद्ध योजनाओं को चलाने में ही खर्च हो जाता है।
चुनावी वादों का बोझ और 'रेवड़ी संस्कृति' की चुनौती
2025 के विधानसभा चुनावों के दौरान किए गए वादों—जैसे मुफ्त बिजली, महिलाओं को आर्थिक सहायता, पेंशन वृद्धि, 1 करोड़ रोजगार और इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश—को लागू करने के लिए भारी-भरकम फंड की जरूरत है।
खर्च के मोर्चे पर ₹100 में से:
- ₹41.55 सामाजिक योजनाओं में
- ₹28.12 सामान्य प्रशासनिक सेवाओं में
- ₹23.39 आर्थिक सेवाओं में
- ₹6.52 पुराने कर्ज चुकाने में खर्च होते हैं।
ऐसे में लोक-लुभावन वादों को पूरा करने के लिए सरकार को बाजार और वित्तीय संस्थानों से लगातार नया कर्ज लेना पड़ रहा है।
3.74 लाख करोड़ का कुल कर्ज, प्रति व्यक्ति ₹28,000 का बोझ
CAG रिपोर्ट और बजटीय विवरण के अनुसार, बिहार पर कुल कर्ज का बोझ ₹3.74 लाख करोड़ के पार पहुंच चुका है। राज्य की कुल आबादी के हिसाब से देखा जाए तो बिहार के हर नागरिक पर औसतन ₹28,000 का कर्ज दर्ज है।
वित्त वर्ष 2026-27 में सरकार ने ₹72,901 करोड़ का नया कर्ज लेने का प्रावधान किया है। इसके अतिरिक्त 'ग्रीन टाउनशिप प्रोजेक्ट्स' के लिए HUDCO के साथ ₹1 लाख करोड़ तक का समझौता किया गया है। वर्तमान में राज्य का कुल कर्ज उसके GSDP का लगभग 39 प्रतिशत है, जो राजकोषीय अनुशासन के लिहाज से उच्च स्तर पर माना जाता है।
गरीबी, कम औद्योगीकरण और युवाओं का पलायन अर्थव्यवस्था में तेजी के दावों के बावजूद बिहार कई राष्ट्रीय विकास सूचकांकों में निचले पायदान पर है। राज्य की लगभग 33.70% आबादी बहुआयामी गरीबी की श्रेणी में आती है। मैन्युफैक्चरिंग (निर्माण) क्षेत्र का रोजगार में योगदान महज 6% है, जबकि कंस्ट्रक्शन सेक्टर में इससे तीन गुना ज्यादा लोग लगे हैं।
औद्योगीकरण की धीमी रफ्तार और सर्विस सेक्टर में अपेक्षित बढ़त न होने के कारण स्थानीय स्तर पर सम्मानजनक रोजगार का अभाव है। यही वजह है कि राज्य का युवा वर्ग आज भी रोजगार की तलाश में दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के राज्यों में पलायन करने को मजबूर है।
आय बढ़ाने के प्रयास बनाम राजकोषीय घाटे का जोखिम
राजस्व में बढ़ोतरी के लिए राज्य सरकार ने हाल के दिनों में कई सख्त कदम उठाए हैं:
- शहरी क्षेत्रों में प्रॉपर्टी टैक्स (Property Tax) में करीब 14% की वृद्धि।
- पंचायतों में टैक्स कलेक्शन ढांचे को मजबूत करना।
- राज्य के राजमार्गों (State Highways) पर चरणबद्ध तरीके से टोल टैक्स लागू करना।
- कमर्शियल व्हीकल और ट्रांसपोर्ट सेक्टर की फीस में बदलाव।
हालांकि, आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आय बढ़ाने के इन ठोस कदमों के बिना केवल बिना-बजट वाली कल्याणकारी योजनाओं पर बेलगाम खर्च जारी रहा, तो राज्य का राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) निर्धारित 3% की मानक सीमा को पार कर जाएगा, जिससे बिहार गहरे वित्तीय संकट में फंस सकता है।





