मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) ने भारत के ऊर्जा और औद्योगिक क्षेत्र में ऐतिहासिक छलांग लगाने की तैयारी की है। कंपनी ने आंध्र प्रदेश के एलुरु जिले में एक इंटीग्रेटेड अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन (UCG) कॉम्प्लेक्स विकसित करने के लिए 30 वर्षों में लगभग ₹2.73 लाख करोड़ के निवेश का प्रस्ताव दिया है।
कोयला मंत्रालय की ई-नीलामी के माध्यम से रिलायंस को आंध्र प्रदेश में चिंतालापुडी और रेचेरला कोयला ब्लॉक हासिल हुए हैं, जिनमें अनुमानित 3.13 बिलियन टन कोयला भंडार (G-12 और G-13 ग्रेड) मौजूद है।
परियोजना का चरणबद्ध ढांचा (Three Phases of Investment)
रिलायंस का यह विशाल निवेश अन्वेषण (Exploration) और इसकी तकनीकी-व्यावसायिक सफलता पर निर्भर करेगा:
- फेज 1 (2026 Q3 - 2027 Q4): पायलट वर्क और एक्सप्लोरेशन पर ₹3,000 करोड़ का शुरुआती निवेश।
- फेज 2 (2028 - 2030): सफलता मिलने पर प्रोजेक्ट डेवलपमेंट पर ₹1.2 लाख करोड़ का खर्च।
- फेज 3 (2030 के बाद): कमर्शियल प्रोडक्शन और परिचालन पर ₹1.5 लाख करोड़ का निवेश।
अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन (UCG) कैसे काम करता है?
पारंपरिक खनन के विपरीत, UCG में कोयले को बाहर निकाले बिना जमीन के अंदर ही गैस में बदला जाता है:
- प्रक्रिया: जमीन में आधे किलोमीटर से अधिक गहराई पर स्थित कोयला परतों तक कुएं खोदे जाते हैं। वहां ऑक्सीजन या भाप भेजकर कोयले का आंशिक दहन कराया जाता है।
- उत्पाद: रासायनिक अभिक्रियाओं से बनने वाली सिनगैस (Syngas) को दूसरे कुएं के जरिए सतह पर लाया जाता है।
- उपयोगिता: सिनगैस में हाइड्रोजन, कार्बन मोनोऑक्साइड और मीथेन होती है। इससे सिंथेटिक नेचुरल गैस (SNG), मेथनॉल, अमोनिया (फर्टिलाइजर का कच्चा माल) और हाइड्रोजन तैयार की जा सकती है, जो स्टील व रिफाइनिंग उद्योगों में काम आती है।
भारत के लिए क्यों जरूरी है यह प्रोजेक्ट?
भारत वर्तमान में LNG की आधी से ज्यादा मांग, यूरिया की 20%, अमोनिया की लगभग पूरी और मेथनॉल की 80-90% जरूरत आयात से पूरी करता है। वित्त वर्ष 2025 में इन आयातित सामग्रियों पर भारत ने करीब ₹2.77 लाख करोड़ खर्च किए थे।
- इंपोर्ट पर निर्भरता में कमी: घरेलू स्तर पर SNG और अमोनिया बनने से महंगे विदेशी आयात और मुद्रा में उतार-चढ़ाव का जोखिम कम होगा।
- राष्ट्रीय लक्ष्य में योगदान: भारत सरकार का लक्ष्य 20230 तक 100 मिलियन टन कोयला गैसीफाई करने का है। रिलायंस के ब्लॉक से मिलने वाला कोयला इस लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
- डाउनस्ट्रीम फ्लेक्सिबिलिटी: रिलायंस की पेट्रोकेमिकल और रिफाइनिंग क्षमताओं को इस प्रोजेक्ट से सस्ता और घरेलू कार्बन फीडस्टॉक मिलेगा।
तकनीकी चुनौतियां और जोखिम
UCG प्रोजेक्ट्स का सबसे बड़ा जोखिम धरातल के नीचे की अनिश्चितताएं हैं:
- 600 मीटर से अधिक गहराई पर भू-जल संरक्षण, गैस लीकेज को रोकना और जमीन धंसने (Subsidence) से बचाना एक बड़ी तकनीकी चुनौती है।
- रिलायंस का पहला ₹3,000 करोड़ का पायलट चरण यह साबित करेगा कि क्या भारतीय परिस्थितियों में UCG व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य और पर्यावरण के अनुकूल है।
यदि यह परियोजना सफल होती है, तो यह न केवल रिलायंस के एनर्जी पोर्टफोलियो को नया आयाम देगी, बल्कि भारत को वैश्विक ऊर्जा झटकों से सुरक्षित करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित होगी।





