यदि आप भी बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) कराने से पहले प्राइवेट रेटिंग एजेंसियों द्वारा दी गई AAA या AA+ रेटिंग देखकर निश्चिंत हो जाते थे, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने इस व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव किया है। बैंकिंग सेक्टर के रेगुलेटर RBI ने बैंक डिपॉजिट्स की क्रेडिट रेटिंग्स से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है।
केंद्रीय बैंक का स्पष्ट मानना है कि बैंकों में जमा पूंजी की वास्तविक सुरक्षा उसके अपने कड़े रेगुलेटरी सुपरविजन (निरीक्षण) से तय होती है, न कि कमर्शियल रेटिंग एजेंसियों के प्राइवेट आकलन से।
RBI ने बैंक डिपॉजिट रेटिंग्स से दूरी क्यों बनाई?
- पारदर्शिता और भ्रम से बचाव: आम निवेशक अक्सर क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की हाई रेटिंग को 'RBI द्वारा प्रमाणित सुरक्षा' मान लेते हैं। इस भ्रम को दूर करने के लिए यह निर्णय लिया गया है।
- रेटिंग एजेंसियों का ट्रैक रिकॉर्ड: जब भी किसी वित्तीय संस्थान में संकट आता है, रेटिंग एजेंसियां अंतिम समय तक हाई रेटिंग बनाए रखती हैं और संकट गहराने पर अचानक डाउनग्रेड कर देती हैं।
- सटीक निगरानी: बैंकों की असली वित्तीय सेहत का आकलन RBI अपने प्रत्यक्ष निरीक्षण, नेट एनपीए (NPA) और कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो (CRAR) जैसे मानकों से करता है।
निवेशकों और बैंकिंग सिस्टम पर असर
1. आम निवेशकों के लिए मुख्य बातें:
- बैलेंस शीट की जांच आवश्यक: अब केवल रेटिंग के भरोसे रहने के बजाय निवेशकों को बैंक के एनपीए स्तर, लाभप्रदता और प्रोविजनिंग जैसे बुनियादी मानकों को देखना होगा।
- ₹5 लाख का बीमा कवर बरकरार: इस निर्णय से जमा बीमा सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ेगा। DICGC (डिपॉज़िट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन) के नियमों के तहत प्रत्येक शेड्यूल्ड बैंक में ₹5 लाख तक की कुल जमा पूंजी पूरी तरह सुरक्षित रहती है।
2. बैंकिंग सिस्टम पर प्रभाव:
- बैंक अब अपनी विज्ञापनों और मार्केटिंग अभियानों में रेटिंग एजेंसियों की हाई रेटिंग्स को मुख्य आकर्षण के रूप में आसानी से इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।
- नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (NBFCs) के लिए क्रेडिट रेटिंग अनिवार्य रह सकती है, लेकिन कमर्शियल बैंकों के लिए RBI का सख्त निगरानी ढांचा ही प्राथमिक सुरक्षा गारंटी बना रहेगा।





