अमेरिका के न्यू यॉर्क में 'वन वर्ल्ड वन ह्यूमैनिटी' कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत के हिंदू-मुस्लिम एकता पर दिए गए बयान ने भारत की राजनीति में नया उबाल ला दिया है। भारतीय-अमेरिकी समुदाय के 6,000 से अधिक लोगों को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा था कि जो हिंदू यह मानता है कि मुसलमानों को भारत से बाहर निकाल देना चाहिए, वह हिंदू नहीं रह सकता।

विविधता में एकता को भारत का 'डीएनए' बताने वाले इस बयान पर भारत के राजनीतिक गलियारों और धार्मिक नेताओं की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।

विपक्षी नेताओं ने उठाए सवाल: 'विदेश में ज्ञान, देश में चुप्पी क्यों?'

  • कपिल सिब्बल (राज्यसभा सांसद): "शब्दों से ज्यादा कर्म मायने रखते हैं। विदेशों में ज्ञानवर्धक बातें करना और घर में इस मुद्दे पर चुप रहना विरोधाभासी है।"
  • मनोज झा (RJD सांसद): "क्या मोहन भागवत को इस दिव्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए मैडिसन स्क्वायर जाना पड़ा? उन्हें यह बात देश के उन मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को समझानी चाहिए जिनके दिन की शुरुआत ही हिंदू-मुसलमान से होती है।"
  • राशिद अल्वी (कांग्रेस): "अगर भारत में सब ठीक है तो अमेरिका जाकर यह सफाई देने की क्या जरूरत थी? इससे साबित होता है कि समस्या मौजूद है। संघ को अपनी मुस्लिम विरोधी सोच बदलनी होगी।"
  • तारिक अनवर (कांग्रेस): बयान का स्वागत करते हुए कहा कि यह पहली बार है जब आरएसएस प्रमुख ने अल्पसंख्यकों को लेकर खुलकर ऐसी सकारात्मक चिंता जताई है, लेकिन इस पर देश में अमल होना चाहिए।
  • अवधेश प्रसाद (सपा सांसद): "देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। भागवत जी को यही सीख अपनी ही सरकारों में बैठे नेताओं को देनी चाहिए।"

मुस्लिम धर्मगुरु और सामाजिक प्रतिनिधियों ने किया स्वागत

  • इकबाल अंसारी (पूर्व याचिकाकर्ता, बाबरी मामला): भागवत के बयान की तारीफ करते हुए कहा कि यह देश में भाईचारे का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है। देश को ऐसे ही नेतृत्व की जरूरत है जो सबको साथ लेकर चले।
  • मौलाना साजिद रशीदी (अध्यक्ष, ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन): "शिक्षा और मोहब्बत ही देश की कामयाबी की कुंजी है। जो लोग दिलों में नफरत फैलाकर देश को तोड़ना चाहते हैं, सरकार और संघ दोनों को उनके खिलाफ सख्त कदम उठाने होंगे।"

क्या कहा था मोहन भागवत ने?

मैडिसन स्क्वायर गार्डन स्थित इंफोसिस थिएटर में बोलते हुए संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया था कि मानवता की एकता की हिंदू अवधारणा में किसी भी समुदाय को बाहर करने की कोई जगह नहीं है। विविधता का सम्मान और स्वीकार्यता ही भारतीय संस्कृति की असली पहचान है।