हिमाचल प्रदेश सरकार के वन विभाग और इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (ISB) के भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी (ISB-BIPP) ने राज्य की 'फॉरेस्ट एंड पास्टोरल इकोनॉमी' (Forest and Pastoral Economy) की क्षमता को बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण 5-वर्षीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू की उपस्थिति में हुए इस समझौते का मुख्य उद्देश्य डेटा, विज्ञान और स्थानीय समुदायों के सहयोग से वनों का बेहतर प्रबंधन एवं आजीविका के अवसरों का सृजन करना है।
एमओयू के मुख्य स्तंभ और पहलें
- वन अर्थव्यवस्था और सामुदायिक उद्यम: स्थानीय ग्रामीणों और महिला उत्पादक कंपनियों (Producer Companies) को सशक्त बनाकर वन उपजों के प्रसंस्करण और सीधे विपणन (Direct Marketing) से जोड़ा जाएगा। (उदा. पांगी की पीर पंजाल जंगल प्रोड्यूसर कंपनी द्वारा थंगी/हेज़लनट का व्यापार)।
- फॉरेस्ट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म: सैटेलाइट इमेजरी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर आधारित इस डिजिटल प्लेटफॉर्म की शुरुआत पायलट प्रोजेक्ट के रूप में पालमपुर वन मंडल से की जा रही है।
- ग्रेजिंग पोर्टल एवं चरवाहा डेटाबेस: 'हिमाचल प्रदेश चरवाहा नीति 2026' के तहत चरवाहों के लिए एक समर्पित पोर्टल विकसित किया जाएगा, जिसे राज्य एवं केंद्रीय पशुधन व पहचान प्रणालियों ('पहल' योजना आदि) के साथ एकीकृत किया जाएगा।
- क्षमता निर्माण व प्रशिक्षण: वन कर्मियों और स्थानीय हितधारकों को डेटा-आधारित वन प्रबंधन तथा उद्यम संचालन का विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा।
जंगलों से ₹22,600 करोड़ का संभावित 'हरित खजाना'
ISB-BIPP और वन विभाग की संयुक्त रिपोर्ट ‘Counting Green Wealth’ के अनुसार, राज्य के जंगलों में मौजूद 5 प्रमुख जैविक संसाधनों का अनुमानित मूल्य:
| वन संसाधनअनुमानित मूल्य (रुपये में) | |
| आंवला | ₹8,700 करोड़ |
| चीड़ की पत्तियां (Pine Needles) | ₹5,500 करोड़ |
| जंगली आम | ₹4,800 करोड़ |
| साल के बीज | ₹2,400 करोड़ |
| बुरांश के फूल | ₹1,200 करोड़ |
| कुल संभावित मूल्य | ₹22,600 करोड़ |
पर्यावरण और ग्रामीण जीवन पर सकारात्मक प्रभाव
यह साझेदारी पर्यावरण संरक्षण और आजीविका के बीच संतुलन स्थापित करेगी:
- आग के खतरे से बचाव: जंगलों में आग (Forest Fire) का मुख्य कारण बनने वाली चीड़ की पत्तियों का अब व्यावसायिक इस्तेमाल (ऊर्जा उत्पादन व हस्तशिल्प) में किया जाएगा।
- आय में सीधी वृद्धि: हरड़, बेल और थंगी जैसे स्थानीय औषधीय और वन उत्पादों के मूल्य संवर्धन (Value Addition) से ग्रामीण परिवारों और चरवाहा समुदायों की आय में प्रत्यक्ष सुधार देखने को मिलेगा।





